संघ के पंजीकरण को लेकर फिर गरमाई राजनीति
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को लेकर कांग्रेस और उसके वैचारिक सहयोगियों ने एक बार फिर पुराना सवाल उठाया है कि आखिर संघ का पंजीकरण प्रमाणपत्र कहां है। कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खरगे के बयान और उसके बाद कांग्रेस नेताओं द्वारा उठाए गए सवालों ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि संघ की ओर से इस पर स्पष्ट प्रतिक्रिया दी गई है और सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि “हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं है।”
संघ का कहना है कि उसकी स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने एक सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में की थी। उस समय भारत अंग्रेजों के अधीन था और किसी स्वैच्छिक संगठन के अस्तित्व के लिए सरकारी पंजीकरण आवश्यक नहीं था। स्वतंत्र भारत के संविधान में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो हर सामाजिक संगठन के लिए पंजीकरण को अनिवार्य बनाता हो।
क्या वास्तव में पंजीकरण अनिवार्य है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(c) नागरिकों को संगठन और संघ बनाने की स्वतंत्रता देता है। यह एक मौलिक अधिकार है। संविधान कहीं भी यह नहीं कहता कि हर सामाजिक, सांस्कृतिक या वैचारिक संगठन को पहले सरकारी रजिस्टर में दर्ज होना अनिवार्य है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार सोसायटी एक्ट, ट्रस्ट एक्ट अथवा अन्य कानून संगठन के संचालन, संपत्ति या विशेष प्रकार की गतिविधियों के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं, लेकिन उनका अस्तित्व केवल पंजीकरण पर निर्भर नहीं करता।
क्या कांग्रेस की आपत्ति पंजीकरण को लेकर है या संघ के प्रभाव को लेकर?
संघ समर्थकों का मानना है कि कांग्रेस की वास्तविक चिंता संघ के पंजीकरण को लेकर नहीं बल्कि उसके बढ़ते सामाजिक प्रभाव को लेकर है। संघ पिछले सौ वर्षों से बिना सरकारी अनुदान, बिना विदेशी सहायता और बिना सत्ता के सहारे समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करता रहा है।
शिक्षा, ग्राम विकास, सेवा कार्य, आपदा राहत, वनवासी कल्याण, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता जैसे क्षेत्रों में संघ से प्रेरित हजारों संगठन सक्रिय हैं। संघ के समर्थकों का तर्क है कि जिस संगठन ने करोड़ों लोगों को वैचारिक और सामाजिक रूप से जोड़ा हो, उससे राजनीतिक दलों की बेचैनी स्वाभाविक है।
डॉ. हेडगेवार ने क्यों चुना अलग मॉडल?
संघ की स्थापना करने वाले डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने इसे पारंपरिक संस्थागत ढांचे के बजाय शाखा और स्वयंसेवा के आधार पर विकसित किया। संघ में सदस्यता कार्ड या औपचारिक पंजीकरण की बाध्यता नहीं रखी गई। कोई भी व्यक्ति शाखा में जाकर स्वयंसेवक बन सकता है।
यही कारण है कि संघ स्वयं को समाज आधारित आंदोलन मानता है, न कि एक कार्यालयी संस्था।
प्रतिबंधों और राजनीतिक विरोध के बावजूद बढ़ता रहा संघ
संघ के इतिहास में कई बार प्रतिबंध लगे। महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। आपातकाल के दौरान हजारों स्वयंसेवकों को जेल भेजा गया। बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद भी संगठन को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा।
इसके बावजूद संघ का विस्तार लगातार बढ़ता गया। समर्थकों का कहना है कि इसका कारण यह है कि संघ की शक्ति सत्ता से नहीं बल्कि समाज से आती है।
मोहन भागवत ने भी हाल के अपने एक वक्तव्य में कहा था कि सरकारें समय-समय पर संघ पर प्रतिबंध लगाती रही हैं, लेकिन इससे यह भी सिद्ध होता है कि सरकारें संघ के अस्तित्व और प्रभाव को स्वीकार करती रही हैं।
पारदर्शिता और आर्थिक सवालों पर क्या है स्थिति?
संघ विरोधी अक्सर आर्थिक पारदर्शिता और गुरु दक्षिणा से प्राप्त होने वाली धनराशि को लेकर सवाल उठाते हैं। हालांकि विभिन्न न्यायिक फैसलों में स्वयंसेवकों द्वारा दिए गए स्वैच्छिक योगदान को कर योग्य आय नहीं माना गया है।
संघ से जुड़े कई सेवा और शैक्षणिक संगठन विधिवत पंजीकृत हैं और नियमित रूप से अपने लेखा-जोखा तथा प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हैं। संघ का तर्क है कि जहां कानून लागू होता है वहां उसका पालन किया जाता है।
कांग्रेस पर भी उठते रहे हैं सवाल
संघ समर्थकों का कहना है कि दशकों तक सत्ता में रही कांग्रेस स्वयं आपातकाल, भ्रष्टाचार, परिवारवाद और विदेशी प्रभाव जैसे आरोपों का सामना करती रही है। ऐसे में संघ से राष्ट्रभक्ति और पारदर्शिता का प्रमाण मांगना राजनीतिक विरोध का हिस्सा अधिक प्रतीत होता है।
संघ के आलोचक जहां उसकी विचारधारा को लेकर सवाल उठाते हैं, वहीं समर्थकों का कहना है कि संगठन ने कभी सत्ता की राजनीति को अपना उद्देश्य नहीं बनाया, बल्कि समाज जीवन में राष्ट्रवाद और सेवा की भावना को बढ़ावा दिया।
आपदाओं और संकट के समय सक्रिय रहे स्वयंसेवक
विभाजन के दौरान राहत कार्य, प्राकृतिक आपदाओं में सहायता, कोरोना महामारी के समय भोजन और चिकित्सा सेवाएं, सीमावर्ती क्षेत्रों में सेवा कार्य तथा सैनिक परिवारों की सहायता जैसे अनेक उदाहरण संघ समर्थक प्रस्तुत करते हैं।
उनका कहना है कि संघ को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय उसके सेवा कार्यों के आधार पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
क्या सरकारी मुहर से तय होती है वैधता?
संघ समर्थकों का मानना है कि किसी संगठन की वैधता केवल सरकारी रजिस्टर से तय नहीं होती, बल्कि समाज में उसके योगदान और जनता के विश्वास से होती है। उनका कहना है कि जिस संगठन ने बिना सरकारी सहायता और बिना सत्ता के संरक्षण के सौ वर्षों तक कार्य किया हो, उसकी पहचान उसके स्वयंसेवकों और सेवा कार्यों से होती है।
बहरहाल
संघ को लेकर चल रही बहस केवल पंजीकरण तक सीमित नहीं दिखाई देती, बल्कि यह वैचारिक संघर्ष का हिस्सा भी है। एक पक्ष इसे भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक मानता है, जबकि दूसरा पक्ष उसकी विचारधारा और संरचना पर सवाल उठाता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सौ वर्ष पूरे कर चुका है और भारतीय समाज एवं राजनीति में उसका प्रभाव आज भी चर्चा और बहस का प्रमुख विषय बना हुआ है।