एक देश, अनेक शिक्षा प्रणालियाँ: क्या भारत के हर बच्चे को समान शैक्षिक अवसर मिल रहे हैं?

राष्ट्रीय न्यूनतम शिक्षा मानक लागू करने की उठी मांग, विशेषज्ञों ने शिक्षा व्यवस्था में समानता पर शुरू की बहस

नई दिल्ली। भारत में शिक्षा व्यवस्था की समानता और गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय बहस तेज हो गई है। देश में विभिन्न शिक्षा बोर्डों, अलग-अलग पाठ्यक्रमों और राज्यों के बीच शैक्षणिक असमानताओं को देखते हुए विशेषज्ञों ने “वन नेशन, वन मिनिमम एजुकेशन स्टैंडर्ड” (One Nation, One Minimum Education Standard) लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया है। उनका कहना है कि यदि देशभर में प्रतियोगी परीक्षाएं समान हैं, तो विद्यार्थियों की बुनियादी शिक्षा का स्तर भी कम से कम एक समान होना चाहिए।

एक देश, लेकिन अनेक शिक्षा प्रणालियाँ

भारत में वर्तमान समय में सीबीएसई (CBSE), आईसीएसई (ICSE), विभिन्न राज्य शिक्षा बोर्ड, नवोदय विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय, ओपन स्कूल, मदरसा बोर्ड तथा अंतरराष्ट्रीय शिक्षा बोर्ड जैसी अनेक शिक्षा प्रणालियाँ संचालित हो रही हैं। इन सभी के पाठ्यक्रम, मूल्यांकन प्रणाली और शैक्षणिक स्तर में पर्याप्त अंतर देखने को मिलता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह विविधता भारतीय संस्कृति और भाषाई विरासत के अनुरूप है, लेकिन इससे विद्यार्थियों के बीच शैक्षणिक अवसरों में असमानता भी उत्पन्न होती है।

राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ समान, लेकिन तैयारी अलग-अलग

देशभर के विद्यार्थी अंततः संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), जेईई (JEE), नीट (NEET), सीयूईटी (CUET), एसएससी, बैंकिंग और अन्य राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में समान प्रश्नपत्र का सामना करते हैं।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन परीक्षाओं की तैयारी की बुनियाद सभी राज्यों और बोर्डों में समान नहीं है। कई राज्यों में विज्ञान, गणित और अन्य विषयों का स्तर अलग-अलग होने के कारण विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं में अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

संविधान समान अवसर की बात करता है

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 21ए प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है।

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा का अधिकार केवल विद्यालय तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण और समान आधारभूत शिक्षा उपलब्ध कराना भी सरकार की जिम्मेदारी है।

शिक्षा की गुणवत्ता में व्यापक अंतर

देश के विभिन्न हिस्सों में शिक्षा की गुणवत्ता में भारी अंतर देखने को मिलता है।

कहीं आधुनिक प्रयोगशालाएँ, स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षा उपलब्ध हैं, जबकि कई विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और मूलभूत सुविधाएँ तक उपलब्ध नहीं हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल समान परीक्षा आयोजित करने से समान अवसर सुनिश्चित नहीं हो सकते, जब तक बुनियादी शिक्षा का स्तर समान न हो।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने दिए सुधार के संकेत

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) में बहुभाषिक शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षा, बुनियादी साक्षरता तथा लचीले पाठ्यक्रम जैसी अनेक महत्वपूर्ण पहलें शामिल की गई हैं।

हालांकि शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अभी भी ऐसा कोई राष्ट्रीय न्यूनतम शैक्षणिक मानक लागू नहीं किया गया है, जो यह सुनिश्चित कर सके कि देश के प्रत्येक विद्यार्थी को समान आधारभूत ज्ञान प्राप्त हो।

‘वन नेशन, वन सिलेबस’ नहीं, बल्कि ‘वन नेशन, वन मिनिमम एजुकेशन स्टैंडर्ड’ की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे देश में एक समान पाठ्यक्रम लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा क्योंकि प्रत्येक राज्य की अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास है।

इसके बजाय “वन नेशन, वन मिनिमम एजुकेशन स्टैंडर्ड” लागू किया जा सकता है, जिसके अंतर्गत सभी बोर्डों के विद्यार्थियों के लिए गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, भारतीय इतिहास की मूल रूपरेखा, पर्यावरण, डिजिटल साक्षरता और जीवन कौशल जैसे विषयों का न्यूनतम राष्ट्रीय स्तर सुनिश्चित किया जाए।

राज्यों को अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति और स्थानीय इतिहास पढ़ाने की पूर्ण स्वतंत्रता बनी रह सकती है।

शिक्षा का बढ़ता व्यावसायीकरण भी चिंता का विषय

विशेषज्ञों ने शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण पर भी चिंता जताई है।

कई निजी विद्यालयों में अभिभावकों को निर्धारित दुकानों से ही पुस्तकें, यूनिफॉर्म और अन्य सामग्री खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है। विभिन्न राज्यों में शिक्षा का खर्च भी काफी अलग-अलग है, जिससे समान आय वाले परिवारों पर अलग-अलग आर्थिक बोझ पड़ता है।

फीस और यूनिफॉर्म के लिए पारदर्शी व्यवस्था की मांग

विशेषज्ञों का सुझाव है कि निजी विद्यालयों की फीस निर्धारण के लिए पारदर्शी राष्ट्रीय दिशा-निर्देश बनाए जाएं, ताकि मनमानी फीस वृद्धि पर नियंत्रण लगाया जा सके।

इसी प्रकार यूनिफॉर्म के लिए भी ऐसे मानक विकसित किए जाएं, जिससे अभिभावक किसी भी अधिकृत विक्रेता से निर्धारित गुणवत्ता के अनुसार वस्त्र खरीद सकें और उन्हें एक ही दुकान से खरीदने के लिए बाध्य न किया जाए।

शिक्षा सुधार से मजबूत होगी राष्ट्र की नींव

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश के प्रत्येक बच्चे को समान आधारभूत शिक्षा उपलब्ध कराई जाए, तो राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में अवसरों की असमानता कम होगी, प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को बेहतर अवसर मिलेंगे तथा शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा।

उनका कहना है कि भारत यदि ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, तो सबसे पहले उसे अपने सभी बच्चों के लिए समान प्रारंभिक शैक्षणिक अवसर सुनिश्चित करने होंगे।

राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की विविधता को बनाए रखते हुए शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है। उनका सुझाव है कि “नेशनल मिनिमम एजुकेशन स्टैंडर्ड” पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा शुरू की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी विद्यार्थी की सफलता उसके राज्य, बोर्ड या जन्मस्थान से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा और मेहनत से निर्धारित हो।

लेखक :  सी एम जैन
संपर्क : +91 9408887777

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *