विदेशी मीडिया की रिपोर्ट में पूर्व राष्ट्रपति पर इजरायली खुफिया एजेंसी से संपर्क के आरोप, अहमदीनेजाद ने सभी दावों को बताया निराधार
नई दिल्ली। ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद को लेकर विदेशी मीडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और खुफिया एजेंसियों की गतिविधियों पर नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी समाचार पत्र द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने कथित तौर पर पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के साथ संपर्क स्थापित करने और उन्हें ईरान की सत्ता परिवर्तन की संभावित रणनीति का हिस्सा बनाने का प्रयास किया था। हालांकि अहमदीनेजाद के कार्यालय ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इन्हें मनगढ़ंत और निराधार बताया है।
खामेनेई से मतभेद के बाद बदली राजनीतिक स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने सार्वजनिक रूप से महमूद अहमदीनेजाद को अगले राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा नहीं लेने की सलाह दी थी। इसके बावजूद अहमदीनेजाद ने 2017 में राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन दाखिल किया।
हालांकि ईरान की गार्जियन काउंसिल ने उनकी उम्मीदवारी को मंजूरी नहीं दी। इसके बाद वर्ष 2021 और बाद के चुनावों में भी उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिली। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लगातार राजनीतिक उपेक्षा के कारण अहमदीनेजाद और ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान के बीच दूरियां बढ़ती चली गईं।
मोसाद के कथित ऑपरेशन का दावा
विदेशी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि वर्ष 2022 के आसपास मोसाद ने अहमदीनेजाद के राजनीतिक प्रभाव और लोकप्रियता का आकलन करते हुए उनसे संपर्क स्थापित करने की योजना बनाई।
रिपोर्ट के अनुसार इजरायल की रणनीति केवल खुफिया जानकारी जुटाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि भविष्य में ईरान की सत्ता व्यवस्था में संभावित बदलाव की स्थिति में अहमदीनेजाद को एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा था। हालांकि इस संबंध में किसी भी सरकारी एजेंसी ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
बुडापेस्ट में हुई कथित गुप्त मुलाकात
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2024 की शुरुआत में हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को इस कथित संपर्क का माध्यम बनाया गया।
बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन विषय पर आयोजित सम्मेलन की आड़ में मोसाद के वरिष्ठ अधिकारियों और अहमदीनेजाद के बीच गोपनीय बैठक कराई गई। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि तत्कालीन मोसाद प्रमुख डेविड बार्निया भी इस बैठक में शामिल हुए थे।
इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
छवि बदलने की कोशिश के भी दावे
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में अहमदीनेजाद ने अपनी सार्वजनिक छवि में बदलाव लाने का प्रयास किया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक सक्रियता दिखाई, अंग्रेजी भाषा का उपयोग बढ़ाया और ईरानी सरकार की कुछ नीतियों की खुलकर आलोचना भी की।
विश्लेषकों का मानना है कि इन बदलावों को लेकर कई तरह की राजनीतिक व्याख्याएं सामने आई हैं, हालांकि इनके पीछे वास्तविक कारणों की पुष्टि नहीं हुई है।
फरवरी 2026 की घटनाओं का उल्लेख
खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि फरवरी 2026 में इजरायली हमलों के दौरान अहमदीनेजाद के आवास के आसपास सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई। इसके बाद कथित रूप से उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बाद में ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) को उनके कथित विदेशी संपर्कों की जानकारी मिली, जिसके बाद उन्हें पूछताछ के लिए हिरासत में लेकर नजरबंद किया गया।
हालांकि इस दावे की भी कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में कई बड़े दावे
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान में संभावित सत्ता परिवर्तन की रणनीति के तहत अहमदीनेजाद को एक संभावित नेतृत्व विकल्प के रूप में देखा गया था। दावा किया गया है कि इस पूरी योजना की जानकारी अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को भी दी जाती रही।
हालांकि इन सभी दावों के समर्थन में किसी सरकार की ओर से कोई आधिकारिक दस्तावेज या सार्वजनिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।
अहमदीनेजाद ने आरोपों को बताया पूरी तरह झूठ
इन सभी दावों के सामने आने के बाद महमूद अहमदीनेजाद के कार्यालय ने तत्काल प्रतिक्रिया देते हुए इन्हें पूरी तरह असत्य बताया है।
उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि मोसाद से संपर्क, भर्ती किए जाने या नजरबंदी से जुड़े सभी आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत हैं और इनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।
आधिकारिक पुष्टि का इंतजार
फिलहाल इन दावों की पुष्टि ईरान, इजरायल या अमेरिका की किसी भी सरकारी एजेंसी ने आधिकारिक रूप से नहीं की है। इसलिए रिपोर्ट में किए गए अधिकांश दावों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया जा सका है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक संबंधित सरकारें या आधिकारिक जांच एजेंसियां स्पष्ट जानकारी नहीं देतीं, तब तक इस पूरे मामले को विदेशी मीडिया रिपोर्टों और दावों के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बढ़ी हलचल
यदि भविष्य में इन दावों की पुष्टि होती है तो इसे पश्चिम एशिया के इतिहास में सबसे साहसिक खुफिया अभियानों में से एक माना जा सकता है। वहीं यदि ये आरोप गलत साबित होते हैं तो यह मामला अंतरराष्ट्रीय सूचना युद्ध और राजनीतिक प्रचार का भी उदाहरण बन सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस मामले पर बनी हुई है।