देहरादून: समुद्र केवल पानी का विस्तार नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार, राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा का केंद्र है। जब ईरान-इजराइल संघर्ष के चलते हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बाधा उत्पन्न हुई, तो दुनिया को एक बार फिर याद आया कि जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है।
1973 के बाद सबसे बड़ा ऊर्जा संकट
विशेषज्ञों के अनुसार, यह 1973 के अरब ऑयल एम्बार्गो के बाद सबसे गंभीर ऊर्जा संकट है। हॉर्मुज़ से गुजरने वाले लगभग 18.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई, जो वैश्विक तेल व्यापार का करीब 20 प्रतिशत है। साथ ही LNG और उर्वरक व्यापार पर भी भारी असर पड़ा।
तेल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 90-120 डॉलर तक पहुंच गईं। एशिया में LNG की कीमतें दोगुनी से अधिक हो गईं। भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों में बिजली, खाना पकाने, परिवहन और खेती की लागत बढ़ गई। कई देशों में रेस्तरां के समय घटाए गए, कार्य सप्ताह छोटा किया गया और बिजली बचाने की अपील की गई।
भारत पर प्रभाव और जन-प्रतिक्रिया
भारत के लिए यह संकट सिर्फ वैश्विक खबर नहीं था। देश में LPG की कमी के बाद इंडक्शन कुकटॉप की बिक्री 3 गुना से 30 गुना तक बढ़ गई। लोग इंतजार नहीं कर रहे थे — उन्होंने खुद स्वच्छ और स्थानीय विकल्प तलाशने शुरू कर दिए।
रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार केवल 10 दिनों की मांग के बराबर है। लंबे संकट में खेती, परिवहन, छोटे उद्योग और आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती अहमियत
संकट के बीच एक सकारात्मक बदलाव भी दिखाई दे रहा है। भारत में सोलर आयात एक साल में 141 प्रतिशत बढ़ गया है। पवन ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज परियोजनाओं को तेजी से मंजूरी दी जा रही है।
रिपोर्ट का मुख्य संदेश साफ है — जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा व्यवस्था बेहद नाजुक है, क्योंकि यह लगातार चलने वाली सप्लाई चेन पर निर्भर है। वहीं सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बैटरियां और इलेक्ट्रिक वाहन एक बार लग जाने के बाद वर्षों तक स्थिर ऊर्जा देते हैं और भू-राजनीतिक संकट से अप्रभावित रहते हैं।
भविष्य की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऊंची कीमतें बनी रहीं, तो दुनिया को 2026 में स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लिए जितना अतिरिक्त निवेश चाहिए, उतनी ही राशि केवल महंगे तेल-गैस खरीदने पर खर्च हो सकती है।
अब सवाल केवल जलवायु परिवर्तन का नहीं रह गया है। सवाल यह भी है कि क्या हमारी ऊर्जा व्यवस्था इतनी कमजोर होगी कि कोई एक जलडमरूमध्य उसे बंधक बना सके?
हॉर्मुज़ संकट ने एक बार फिर साबित कर दिया कि ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु सुरक्षा अब अलग-अलग मुद्दे नहीं रहे। भविष्य स्थानीय, स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा का ही है।