इसरो में बढ़ते इस्तीफों से बढ़ी चिंता, वैज्ञानिकों के पलायन ने खड़े किए कई अहम सवाल

निजी स्पेस कंपनियों की बढ़ती मांग, मिशनों में देरी और रोजगार मॉडल पर उठी बहस

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) से लगातार बढ़ रहे वैज्ञानिकों के इस्तीफों ने देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को लेकर नई बहस छेड़ दी है। हाल के वर्षों में संगठन के कई अनुभवी वैज्ञानिकों के इस्तीफा देने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि आखिर देश के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान से प्रतिभाशाली वैज्ञानिक क्यों बाहर जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि निजी स्पेस कंपनियों के तेज़ी से विस्तार, बेहतर वेतन, तेजी से करियर ग्रोथ और मिशनों में बढ़ती देरी जैसी कई वजहें इस बदलाव के पीछे हो सकती हैं।

वरिष्ठ वैज्ञानिकों के इस्तीफों ने बढ़ाई चिंता

जानकारी के अनुसार इसरो के विभिन्न केंद्रों से पिछले कुछ वर्षों में 120 से अधिक वैज्ञानिक और इंजीनियर इस्तीफा दे चुके हैं। इनमें कई ऐसे विशेषज्ञ भी शामिल बताए जा रहे हैं, जिन्होंने चंद्रयान-3, गगनयान और भारी प्रक्षेपण यानों जैसे महत्वपूर्ण मिशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

बताया जा रहा है कि इसरो के एक प्रमुख सैटेलाइट केंद्र से बड़ी संख्या में अनुभवी वैज्ञानिकों के जाने के बाद संगठन के भीतर प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।

निजी स्पेस सेक्टर के विस्तार से बदला परिदृश्य

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2020 में भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने के बाद स्थिति तेजी से बदली है। पिछले पांच वर्षों में देश में लगभग 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप सामने आए हैं, जिन्होंने सैटेलाइट निर्माण, रॉकेट तकनीक, अंतरिक्ष अनुसंधान और स्पेस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में तेजी से निवेश आकर्षित किया है।

इन कंपनियों ने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए बेहतर वेतन, आधुनिक कार्य संस्कृति और तेज़ निर्णय प्रक्रिया जैसे आकर्षक अवसर उपलब्ध कराए हैं, जिससे कई अनुभवी वैज्ञानिक निजी क्षेत्र की ओर आकर्षित हुए हैं।

मिशनों में देरी भी बनी चर्चा का विषय

इसरो के कई महत्वपूर्ण मिशनों की समय-सीमा आगे बढ़ने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। गगनयान, एसएसएलवी, जीएसएलवी और अन्य परियोजनाओं में निर्धारित कार्यक्रम से देरी होने की चर्चा लगातार बनी हुई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मिशनों में विलंब का असर केवल परियोजनाओं पर ही नहीं पड़ता, बल्कि वैज्ञानिकों के उत्साह और कार्य संस्कृति पर भी पड़ सकता है।

निर्णय प्रक्रिया को लेकर भी उठ रहे सवाल

कुछ पूर्व अधिकारियों और विशेषज्ञों का मानना है कि संगठन में निर्णय लेने की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक केंद्रीकृत होती जा रही है। उनका कहना है कि कई तकनीकी और प्रशासनिक निर्णय उच्च स्तर पर केंद्रित होने से परियोजनाओं की मंजूरी और कार्यान्वयन में समय लग सकता है।

हालांकि इस संबंध में इसरो की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।

निजी कंपनियों में बढ़ी वैज्ञानिकों की मांग

स्पेस सेक्टर में तेजी से बढ़ती निजी कंपनियों को बड़ी संख्या में प्रशिक्षित वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की आवश्यकता है। चूंकि अनुभवी वैज्ञानिक तैयार होने में वर्षों लगते हैं, इसलिए निजी कंपनियां इसरो जैसे संस्थानों में कार्यरत विशेषज्ञों को बेहतर अवसर प्रदान कर अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यही कारण है कि हाल के वर्षों में प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों का निजी क्षेत्र की ओर रुझान बढ़ा है।

रोजगार मॉडल में बदलाव की जरूरत पर चर्चा

अंतरिक्ष नीति से जुड़े कई विशेषज्ञों का सुझाव है कि इसरो को भविष्य में नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की तरह लचीले रोजगार मॉडल पर भी विचार करना चाहिए।

उनका मानना है कि स्थायी कर्मचारियों के साथ परियोजना आधारित विशेषज्ञों और अनुबंधित वैज्ञानिकों की व्यवस्था अपनाने से संगठन को नई प्रतिभाओं को जोड़ने और अनुभवी वैज्ञानिकों को बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

भविष्य की तकनीकों पर बढ़ेगा फोकस

विशेषज्ञों का मानना है कि इसरो को मिशन डिजाइन, सिस्टम इंजीनियरिंग, मानव अंतरिक्ष मिशन, डीप स्पेस एक्सप्लोरेशन, पुनः उपयोग योग्य रॉकेट, न्यूक्लियर प्रोपल्शन और अत्याधुनिक अनुसंधान एवं विकास जैसे क्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता को और मजबूत करना होगा, ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत अपनी बढ़त बनाए रख सके।

सरकार ने उठाए सख्त कदम

वैज्ञानिकों के बढ़ते इस्तीफों को देखते हुए केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण मिशनों से जुड़े अधिकारियों और वैज्ञानिकों के इस्तीफों की प्रक्रिया को और सख्त बनाने का निर्णय लिया है।

नई व्यवस्था के तहत गगनयान जैसे राष्ट्रीय महत्व के मिशनों में कार्यरत ग्रुप-ए वैज्ञानिकों के इस्तीफों को सामान्य प्रशासनिक स्तर पर मंजूरी नहीं दी जाएगी। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय अब अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) द्वारा लिया जाएगा।

सरकार का मानना है कि राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में वर्षों का अनुभव रखने वाले वैज्ञानिकों का अचानक संगठन छोड़ना मिशनों की गति और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर सकता है।

प्रतिभा बनाए रखना बनी सबसे बड़ी चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि पहले अंतरिक्ष क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक युवाओं के लिए इसरो लगभग एकमात्र प्रमुख विकल्प था, लेकिन अब निजी स्पेस उद्योग के तेजी से विस्तार ने रोजगार के कई नए अवसर उपलब्ध करा दिए हैं।

ऐसे में इसरो के सामने अब केवल प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों की भर्ती करना ही नहीं, बल्कि उन्हें लंबे समय तक संगठन से जोड़कर रखना भी बड़ी चुनौती बन गया है।

हालांकि यह भी माना जा रहा है कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र का तेजी से विस्तार देश के लिए एक सकारात्मक संकेत है। यदि सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र बेहतर समन्वय के साथ कार्य करें, तो भारत वैश्विक स्पेस इकोसिस्टम में और अधिक मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।

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