पिथौरागढ़ के दुर्गम गांवों में सड़क संकट: घायल बुजुर्ग महिला को ग्रामीणों ने कंधों पर लादा, 5 किमी की कठिन यात्रा

पिथौरागढ़, विशेष संवाददाता। उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ में प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ विकास की कमी से ग्रामीण जीवन नर्क बना हुआ है। मदकोट ब्लॉक के गोल्फा गांव में हाल की एक घटना इसकी पोल खोल रही है, जहां ग्रामीणों ने घायल 65 वर्षीय महिला को लकड़ी के डंडों और चादर से बनी डोली में कंधों पर उठाकर 5 किलोमीटर पैदल चलकर सड़क तक पहुंचाया। यह घटना न केवल स्थानीय लोगों की मानवीय संवेदनशीलता को दर्शाती है, बल्कि बुनियादी सुविधाओं के अभाव को भी उजागर करती है।

घटना का विवरण: जंगल में हादसा, ग्रामीणों की जान जोखिम में डाली

गोल्फा गांव की रहने वाली खीला देवी (65 वर्ष), पत्नी लक्ष्मण सिंह कोरंगा, मंगलवार को अपने पशुओं के लिए चारा इकट्ठा करने जंगल गईं। घास काटते हुए अचानक फिसलन भरी चट्टानों से गिर पड़ीं, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं। गांव सड़क से लगभग 5 किलोमीटर दूर है और केवल पैदल खड़ंजा रास्ता उपलब्ध है, जहां वाहनों का पहुंचना नामुमकिन है।

स्थानीय युवाओं ने तुरंत कार्रवाई की। उन्होंने उपलब्ध संसाधनों से एक अस्थायी डोली तैयार की—लकड़ी के डंडों को चादर से बांधकर। दर्जनों ग्रामीणों ने बारी-बारी से डोली को कंधों पर उठाया और दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होकर सड़क तक पहुंचे। इस पूरी प्रक्रिया में घंटों लग गए, क्योंकि रास्ता खड़ी चढ़ाइयों और जंगली इलाकों से भरा पड़ा था। सड़क पर पहुंचने के बाद उन्हें टैक्सी में बिठाकर 120 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका इलाज जारी है।

ग्राम प्रधान मुकेश सिंह ने बताया, “हमारे गांव में ऐसी घटनाएं आम हैं। एक छोटी सी चोट भी जानलेवा साबित हो सकती है, क्योंकि समय पर मेडिकल मदद नहीं मिल पाती।” सरपंच डिगर सिंह ने जोड़ा कि युवाओं की यह एकजुटता ही उन्हें बचा रही है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।

लंबित मांगें: दशकों से अधर में लटका सड़क प्रोजेक्ट

पिथौरागढ़ के ये पहाड़ी गांव सालों से सड़क, बिजली, पानी और मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। गोल्फा, तोमिक और बोना जैसे गांवों में करीब 2,000 की आबादी रहती है, जो इन समस्याओं से जूझ रही है। पूर्व जिला पंचायत सदस्य जगत मर्तालिया के अनुसार, गोल्फा को सड़क से जोड़ने की मांग पिछले 10 वर्षों से लगातार उठ रही है। “सरकार ने कई घोषणाएं कीं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हुआ। हमारी आवाज दिल्ली तक नहीं पहुंच पाती,” उन्होंने कहा।

जल जीवन मिशन के तहत नल कनेक्शन तो लगाए गए, लेकिन पानी की एक बूंद भी नहीं आती। संचार सेवाओं की स्थिति और भी खराब है—ग्रामीणों को फोन सिग्नल पकड़ने के लिए ऊंची पहाड़ियों पर चढ़ना पड़ता है, जबकि निजी कंपनियों के टावर आसपास ही मौजूद हैं। मर्तालिया ने चेतावनी दी कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई, तो ग्रामीण जिला मुख्यालय और तहसील स्तर पर धरना-प्रदर्शन को मजबूर होंगे।

व्यापक समस्या: आपदा प्रभावित क्षेत्रों में विकास ठप

पिथौरागढ़ जिला, जो तिब्बत सीमा से सटा हुआ है, प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है। भूस्खलन और बाढ़ ने कई सड़कों को क्षतिग्रस्त कर दिया है, जिससे मदकोट जैसे क्षेत्र और अलग-थलग हो गए। स्थानीय अधिकारियों ने ग्रामीणों की शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए जांच का आश्वासन दिया है। जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक, सड़क निर्माण के लिए प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया है, लेकिन बजट और मौसमी चुनौतियों के कारण देरी हो रही है।

हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि आश्वासनों से अब पेट नहीं भरता। “हमारी महिलाएं और बच्चे रोज जोखिम में हैं। सड़क बनेगी तो गांव बचेगा,” एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा। यह घटना पूरे राज्य के पहाड़ी इलाकों में व्याप्त विकास असमानता की याद दिलाती है, जहां आधुनिक भारत के सपने अभी भी दूर की कौड़ी बने हुए हैं।

आगे की राह: प्रशासन की प्रतिक्रिया और संभावित समाधान

उधर, प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया है। एसडीएम ने बताया कि जल्द ही एक सर्वे टीम गांव पहुंचेगी और सड़क निर्माण की प्रक्रिया तेज की जाएगी। साथ ही, मोबाइल टावर स्थापित करने के लिए बीएसएनएल से बातचीत जारी है। ग्रामीण संगठनों ने मांग की है कि आपदा राहत कोष से तत्काल फंड आवंटित हो। यदि ये कदम उठाए गए, तो न केवल गोल्फा बल्कि आसपास के गांवों को नई जिंदगी मिल सकती है।

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