सहज पालन-पोषण बनाम अनुशासन: भारतीय समाज किस दिशा में बढ़ रहा है?

बच्चों के अधिकार, सीमाएं और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की जरूरत

विशेष विचार | देवेंद्र कुमार बुडाकोटी

आज के बदलते सामाजिक परिवेश में बच्चों की परवरिश को लेकर दृष्टिकोण तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक अनुशासन, पारिवारिक नियंत्रण और सामुदायिक जिम्मेदारी की जगह अब बच्चों को अधिक स्वतंत्रता, सम्मान और विकल्प देने वाली ‘Gentle Parenting’ यानी सहज पालन-पोषण की अवधारणा लोकप्रिय हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ-साथ स्पष्ट सीमाएं और जिम्मेदारी सिखाई जा रही हैं?

हाल ही में कनाडा में एक बच्चे के व्यवहार से जुड़ी एक विमान घटना ने इस बहस को फिर सामने ला दिया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, बच्चे ने अपनी सीट पर बैठने और सीट बेल्ट लगाने से इनकार कर दिया। इसके चलते उड़ान में देरी हुई और अंततः उसे रद्द कर अगले दिन के लिए पुनर्निर्धारित करना पड़ा। इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया कि बच्चे की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

क्या बच्चे के हर व्यवहार को ‘व्यक्तिगत अधिकार’ माना जा सकता है?

बच्चों को अपनी बात रखने, अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और सम्मान के साथ व्यवहार पाने का अधिकार निश्चित रूप से होना चाहिए। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि वे सार्वजनिक स्थान पर ऐसा कोई भी व्यवहार कर सकते हैं जिससे दूसरे लोगों की सुरक्षा, सुविधा या अधिकार प्रभावित हों?

विमान में सीट बेल्ट लगाना केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं है। यह यात्री और अन्य यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। ऐसे में बच्चों की स्वतंत्रता के साथ उन्हें यह समझाना भी आवश्यक है कि व्यक्तिगत अधिकारों की सीमाएं वहां समाप्त होती हैं, जहां दूसरों की सुरक्षा और अधिकार प्रभावित होने लगते हैं।

यही आधुनिक पालन-पोषण की सबसे बड़ी चुनौती है—बच्चे को डराकर नहीं, बल्कि समझाकर अनुशासन सिखाना।

पारंपरिक भारतीय समाज में सामुदायिक अनुशासन

भारतीय समाज में लंबे समय तक बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी केवल माता-पिता तक सीमित नहीं थी। परिवार के बुजुर्ग, रिश्तेदार, शिक्षक और समुदाय के अन्य सदस्य भी बच्चों के व्यवहार को आकार देने में भूमिका निभाते थे।

यदि कोई बच्चा सार्वजनिक स्थान पर अनुचित व्यवहार करता था, तो आसपास के बड़े-बुजुर्ग उसे टोक देते थे। बच्चे को यह एहसास रहता था कि उसके व्यवहार का प्रभाव केवल उस पर नहीं, बल्कि उसके परिवार की प्रतिष्ठा पर भी पड़ता है।

हालांकि इस व्यवस्था का एक दूसरा पक्ष भी था। कई बार अनुशासन के नाम पर बच्चों को कठोर डांट या शारीरिक दंड का सामना करना पड़ता था। आज के समय में इस प्रकार के व्यवहार को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इसलिए आवश्यकता पुराने अनुशासन को ज्यों का त्यों वापस लाने की नहीं, बल्कि उसमें मौजूद सकारात्मक सामाजिक जिम्मेदारी को आधुनिक बाल-पालन की संवेदनशीलता के साथ जोड़ने की है।

‘जेंटल पैरेंटिंग’ की अवधारणा और बदलता दृष्टिकोण

पश्चिमी समाजों में बच्चों के पालन-पोषण के अधिक नरम और समझदारीपूर्ण दृष्टिकोण को लोकप्रिय बनाने में डॉ. बेंजामिन स्पॉक की पुस्तक The Common Sense Book of Baby and Child Care की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने कठोर और अधिनायकवादी पालन-पोषण का विरोध किया तथा बच्चों के प्रति अधिक संवेदनशील व्यवहार पर जोर दिया।

समय के साथ यह विचार और विकसित हुआ। बच्चों की भावनाओं को समझना, उन्हें सम्मान देना, संवाद के माध्यम से व्यवहार सुधारना और शारीरिक दंड से बचना आधुनिक पालन-पोषण के महत्वपूर्ण तत्व बन गए।

यह बदलाव निश्चित रूप से सकारात्मक है। लेकिन समस्या तब पैदा हो सकती है जब स्नेह और स्वतंत्रता को सीमाओं की अनुपस्थिति के रूप में समझ लिया जाए।

बच्चों को सीमाएं भी सिखानी होंगी

मनोवैज्ञानिक कैरोलिन गोल्डमैन ने बच्चों के अनुचित व्यवहार की स्थिति में स्पष्ट और दृढ़ सीमाएं निर्धारित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनके विचार में बच्चों को यह समझना आवश्यक है कि कुछ व्यवहार स्वीकार्य नहीं हैं।

इस दृष्टिकोण की आलोचना भी हुई है और कुछ लोग ‘टाइम-आउट’ जैसी तकनीकों को बच्चों पर मनोवैज्ञानिक दबाव के रूप में देखते हैं। यह बहस अपने आप में महत्वपूर्ण है।

लेकिन दोनों पक्षों के बीच एक साझा बिंदु दिखाई देता है—बच्चों को सीमाओं की आवश्यकता है।

सवाल यह है कि सीमाएं किस प्रकार निर्धारित की जाएं। डर, हिंसा और अपमान के माध्यम से या संवाद, समझ और निरंतरता के माध्यम से?

आधुनिक समाज के लिए बेहतर रास्ता दूसरा होना चाहिए।

परिवार से समाज तक पहुंचता है बच्चे का व्यवहार

बच्चा केवल घर से नहीं सीखता। वह विद्यालय, सड़क, बाजार, इंटरनेट, सोशल मीडिया और अपने आसपास के लोगों से भी व्यवहार सीखता है।

यदि परिवार में बच्चे को हर बात पर यह संदेश मिले कि उसकी इच्छा ही सर्वोच्च है, तो धीरे-धीरे वह यह मान सकता है कि दूसरे लोगों की सुविधा और अधिकार उसके व्यक्तिगत अधिकारों से कम महत्वपूर्ण हैं।

इसके विपरीत यदि उसे बचपन से समझाया जाए कि—

  • अपनी बात रखना सही है,
  • दूसरों का सम्मान करना जरूरी है,
  • नियमों का पालन करना आवश्यक है,
  • गलती होने पर जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए,
  • और स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी आती है,

तो वह अधिक संतुलित नागरिक बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

सार्वजनिक जीवन में बढ़ती सामाजिक उदासीनता

यह बहस केवल बच्चों और माता-पिता तक सीमित नहीं है। इसका एक व्यापक सामाजिक पक्ष भी है।

पहले सार्वजनिक स्थानों पर अनुचित व्यवहार देखकर लोग हस्तक्षेप करते थे। आज बहुत से लोग विवाद या अप्रत्याशित प्रतिक्रिया के डर से चुप रहना पसंद करते हैं।

यह बदलाव भी सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करता है। जब समाज अनुचित व्यवहार पर प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है, तो व्यक्ति को यह संदेश मिल सकता है कि सार्वजनिक नियमों और सामाजिक मर्यादाओं की अनदेखी स्वीकार्य है।

हालांकि सार्वजनिक हस्तक्षेप भी मर्यादित और जिम्मेदार होना चाहिए। किसी बच्चे को अपमानित करना या हिंसा करना समाधान नहीं है। आवश्यकता सामाजिक जिम्मेदारी और संवेदनशील हस्तक्षेप की है।

अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जरूरी

आधुनिक लोकतांत्रिक समाज व्यक्तिगत अधिकारों को अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है। लेकिन कोई भी अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं होता।

व्यक्ति को स्वतंत्रता है, लेकिन उसे दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान भी करना होता है। बच्चे को अपनी इच्छा व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन उसे सार्वजनिक सुरक्षा के नियमों का पालन भी करना होगा।

यही बात बचपन से सिखाना आवश्यक है।

अधिकार + जिम्मेदारी + सीमाएं = स्वस्थ सामाजिक व्यवहार

यदि बच्चे को केवल अधिकार सिखाए जाएं और जिम्मेदारियां नहीं, तो भविष्य में सामाजिक संघर्ष बढ़ सकता है। वहीं यदि केवल अनुशासन सिखाया जाए और बच्चे की भावनाओं तथा गरिमा की अनदेखी की जाए, तो उसके व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

भारत के लिए क्या हो सकता है बेहतर रास्ता?

भारत को न तो कठोर और अधिनायकवादी पालन-पोषण की ओर लौटने की आवश्यकता है और न ही ऐसी असीमित स्वतंत्रता की ओर जाने की, जिसमें माता-पिता बच्चे के अनुचित व्यवहार को भी उचित ठहराने लगें।

बेहतर रास्ता दोनों दृष्टिकोणों के सकारात्मक पक्षों को जोड़ना है।

बच्चों को प्यार मिले, लेकिन सीमाएं भी हों।
उन्हें सम्मान मिले, लेकिन जिम्मेदारी भी सिखाई जाए।
उन्हें स्वतंत्रता मिले, लेकिन दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी बताया जाए।
उन्हें अपनी बात रखने का अवसर मिले, लेकिन हर इच्छा को पूरा करना जरूरी न माना जाए।

यही संतुलित पालन-पोषण भविष्य में जिम्मेदार नागरिक तैयार कर सकता है।

नई पीढ़ी के नागरिक कैसे तैयार होंगे?

आज का बच्चा ही कल का नागरिक, मतदाता, अधिकारी, शिक्षक, वैज्ञानिक, व्यवसायी और जनप्रतिनिधि बनेगा। इसलिए पालन-पोषण केवल निजी पारिवारिक विषय नहीं है; यह भविष्य के समाज के निर्माण से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

हमें ऐसे बच्चों की आवश्यकता है जो आत्मविश्वासी हों, लेकिन अहंकारी नहीं; स्वतंत्र हों, लेकिन गैर-जिम्मेदार नहीं; संवेदनशील हों, लेकिन कमजोर नहीं; और अधिकारों के प्रति जागरूक होने के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझते हों।

आधुनिक पालन-पोषण की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि हम बच्चों को अनुशासन और स्वतंत्रता के बीच सही संतुलन कैसे सिखाते हैं।

बच्चों को डराकर नियंत्रित करना समाधान नहीं है, लेकिन हर अनुचित व्यवहार को ‘बच्चे की स्वतंत्रता’ कहकर स्वीकार कर लेना भी उचित नहीं। परिवार, विद्यालय और समाज को मिलकर ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी, जिसमें बच्चे की गरिमा और स्वतंत्रता का सम्मान हो, लेकिन स्पष्ट सामाजिक सीमाओं और जिम्मेदारियों की समझ भी विकसित हो।

शायद भारतीय समाज के लिए सही रास्ता यही है—पारंपरिक सामुदायिक जिम्मेदारी के सकारात्मक तत्वों को आधुनिक, संवेदनशील और सम्मानजनक पालन-पोषण के साथ जोड़ना।

क्योंकि अच्छे माता-पिता केवल आज्ञाकारी बच्चे नहीं बनाते; वे ऐसे नागरिक तैयार करते हैं जो समझते हैं कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल अपने अधिकार जानना नहीं, बल्कि दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी है।

— देवेंद्र कुमार बुडाकोटी
लेखक समाजशास्त्री हैं और जेएनयू, नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं। उनके शोध का उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन की पुस्तकों में किया गया है।

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