शाश्वती मंडल की हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायकी ने विरासत महोत्सव में बांधा समां

क्राफ्ट वर्कशॉप में स्कूली बच्चों का उत्साहपूर्ण प्रदर्शन

देहरादून, 15 अक्टूबर 2025: रीच संस्था के तत्वावधान में आयोजित विरासत महोत्सव-2025 में विभिन्न स्कूलों के 86 होनहार बच्चों ने क्राफ्ट कार्यशाला में अपनी रचनात्मक प्रतिभा का अनोखा प्रदर्शन किया। बच्चों ने मिट्टी के बर्तन गढ़ना, पतंग निर्माण, कागज के फूल बनाना तथा कपड़े से आकर्षक वस्तुओं की रचना सीखी। इसके अलावा, डॉल निर्माण, ग्लास-बोतलों पर पेंटिंग और ब्लॉक प्रिंटिंग जैसी कलाओं में भी उन्होंने हाथ आजमाया। लतिका बिहार स्कूल के 40, ओलम्पस हाई के 10, श्री गुरु राम राय पब्लिक स्कूल बालावाला के 16 तथा लतिका रॉय फाउंडेशन के 20 बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। एसजीआरआर पब्लिक स्कूल के विदित बर्थवाल और ओलम्पस हाई के छात्रों ने दिल्ली के देवेंद्र चाचा से मिट्टी के बर्तन बनाने की कला सीखी, जबकि रामपुर (उत्तर प्रदेश) के शावेज मियां से पतंगबाजी और अन्य आइटमों का हुनर अर्जित किया। बच्चों के चेहरों पर दिखा उत्साह इस कार्यशाला को यादगार बनाता रहा। वॉलंटियर्स नेहा जोशी, अरिहंत और अनुज ने बच्चों के साथ घुलमिलकर कार्यक्रम को जीवंत बनाया।

सांस्कृतिक संध्या का भव्य उद्घाटन

विरासत महोत्सव की संध्या का शुभारंभ यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस की सीएमडी गिरिजा एस. रहीं ने किया। उन्होंने इस आयोजन को कला और शास्त्रीय संगीत के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने में सहायक हैं। संध्या की मुख्य आकर्षण ग्वालियर घराने की प्रख्यात हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका शाश्वती मंडल की मनमोहक प्रस्तुति रही, जिसने दर्शकों पर जादू सा असर छोड़ा।

शाश्वती मंडल: ग्वालियर घराने की धाकड़ गायिका

शाश्वती मंडल (जन्म 1971) हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रमुख हस्ती हैं, जो ग्वालियर घराने की अनुयायी हैं। संगीतकार परिवार में जन्मीं शाश्वती के नाना पंडित बालाभाऊ उम्डेकर ‘कुंडलगुरु’ ग्वालियर शाही दरबार के दरबारी गायक थे। मात्र सात वर्ष की उम्र से सार्वजनिक प्रदर्शन शुरू करने वाली शाश्वती ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मां कमल मंडल से प्राप्त की। 1987-1992 तक संस्कृति विभाग (भारत सरकार) की छात्रवृत्ति पर पंडित बालासाहेब पूंछवाले से ग्वालियर गायकी और टप्पा कला की बारीकियां सीखीं। इसके अलावा, ठुमरी के लिए पूर्णिमा चौधरी, ध्रुपद के लिए गुंदेचा बंधुओं तथा गजल के लिए सरबत हुसैन से प्रशिक्षण लिया। संस्कृति फाउंडेशन की मणि मान फेलोशिप पर मधुप मुद्गल के अधीन अध्ययन किया। कुमार गंधर्व और जयपुर-अतरौली घराने से प्रभावित शाश्वती टप्पा गायन की अग्रणी गायिकाओं में शुमार हैं। उन्होंने भारत और विदेशों में सवाई गंधर्व महोत्सव (पुणे), दरबार महोत्सव (यूके), सप्तक वार्षिक संगीत महोत्सव (अहमदाबाद) जैसे प्रमुख मंचों पर प्रस्तुति दी। ऑल इंडिया रेडियो में ‘उच्चतम’ श्रेणी की कलाकार और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की सूचीबद्ध कलाकार शाश्वती को मणि मान फेलोशिप, सीनियर फेलोशिप (महिला संगीतकारों पर शोध), दुर्गा सम्मान आदि पुरस्कार मिले। वे एआईआर भोपाल में स्टाफ कलाकार और मुंबई विश्वविद्यालय में संगीत की सहायक प्रोफेसर रहीं। उनकी पूर्ण-स्वर वाली गूंजदार आवाज, तान-मुरकी की स्पष्टता और विविध शैलियों का समावेश उनकी गायकी को अनूठा बनाता है।

शाश्वती की प्रस्तुति: रागों का जादुई संसार

शाश्वती ने अपनी प्रस्तुति राग जयजयवंती के विलंबित ख्याल से शुरू की, जिसमें बंदिश “माथे जद चंदा…” ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इसके बाद धृत एकताल में “बैरन जागी…” की बंदिश गाई। कार्यक्रम का समापन राग खमाज के मनोरम टप्पा “चल पहचानी ए मिया मैं तो…” से किया, जो टप्पा कला की महीन बारीकियों को उजागर करता रहा। हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्र, तबले पर पंडित मिथिलेश झा तथा तानपुरा पर शिष्या चिन्मयी आठले साठे की संगत ने प्रस्तुति को और समृद्ध बनाया। उनकी गायकी ने विरासत महोत्सव की संध्या को शास्त्रीय संगीत की यादगार शाम में बदल दिया।

पद्म भूषण जतिन दास का ज्ञानवर्धक टॉक शो

विरासत महोत्सव के सत्र में यूपीएसई में पद्म भूषण जतिन दास का “पारंपरिक एवं समकालीन कला” पर टॉक शो आयोजित हुआ। जन्म 2 दिसंबर 1941 को ओडिशा के मयूरभंज में हुए जतिन दास चित्रकार, मूर्तिकार, भित्तिचित्रकार, प्रिंटमेकर और शिक्षक हैं। सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, बॉम्बे से प्रशिक्षित दास ने 60 वर्षों से अधिक समय में 71 से ज्यादा एकल प्रदर्शनियां कीं। वेनिस और टोक्यो बिएनाले सहित वैश्विक मंचों पर भाग लिया। 2012 में पद्म भूषण, उत्कल अवॉर्ड (2006), भारत निर्माण अवॉर्ड (2007) जैसे सम्मानों से नवाजे गए। उन्होंने जे.डी. सेंटर ऑफ आर्ट की स्थापना की और जमिया मिलिया इस्लामिया, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा आदि में विजिटिंग प्रोफेसर रहे। उनकी कला तेल, जलरंग, इंक, ग्राफिक्स और कांते में मानवीय अनुभवों को दर्शाती है। लॉकडाउन में 200 इंक पेंटिंग्स की श्रृंखला “एग्जोडस 2020” बनाई।

टॉक शो में जतिन दास ने अपनी जड़ों, देश और संस्कृति से जुड़ाव पर जोर दिया। प्राकृतिक-जैविक प्रथाओं, सच्चाई, रचनात्मकता, प्रामाणिकता और सरलता को अपनाने की सलाह दी। कला को मानव अनुभव आकार देने वाला माध्यम बताते हुए नृत्य, संगीत, चित्रकला आदि का अनुसरण करने का आह्वान किया। पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन में उनकी प्रमुख कलाकृतियां दिखाई गईं, जो पारंपरिक कला के समकालीन सार को उजागर करती रहीं। प्रश्नोत्तर सत्र में दर्शकों के साथ संवाद कर उन्होंने कलात्मक अभिव्यक्ति के अनुभव साझा किए।

विरासत महोत्सव: सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण

यह आयोजन बच्चों की रचनात्मकता और शास्त्रीय कला के संरक्षण को जोड़ता है, जो नई पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

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