देवेंद्र कुमार बुडाकोटी
नई दिल्ली। प्रश्नपत्र लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर आयोजित एक प्रदर्शन के दौरान पोस्टरों, बैनरों, नारों और सोशल मीडिया सामग्री में प्रयुक्त अपमानजनक एवं अशोभनीय भाषा ने सार्वजनिक विमर्श में नई बहस को जन्म दे दिया है। इस घटनाक्रम ने केवल आंदोलन की शैली ही नहीं, बल्कि समाज में बदलती भाषा, पारिवारिक संस्कार, नैतिक शिक्षा और सार्वजनिक आचरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
लेखक देवेंद्र कुमार बुडाकोटी का मानना है कि सार्वजनिक आंदोलनों में बढ़ती गाली-गलौज केवल असहमति व्यक्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज में नैतिक मूल्यों के क्षरण, पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी और सामाजिक मर्यादाओं में आ रहे बदलाव का संकेत भी हो सकती है।
परिवार और विद्यालय से शुरू होती है नैतिक शिक्षा
लेख के अनुसार किसी भी सभ्य समाज की नींव नैतिक मूल्यों पर टिकी होती है। इन मूल्यों की पहली शिक्षा परिवार में मिलती है, जबकि विद्यालय और समाज उन्हें आगे विकसित करते हैं। पहले यदि बच्चे या युवा सार्वजनिक स्थानों पर अभद्र भाषा का प्रयोग करते थे, तो बड़े-बुजुर्ग उन्हें तुरंत टोककर सुधारने का प्रयास करते थे।
लेखक का कहना है कि आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। अधिकांश लोग किसी को टोकने या समझाने से बचते हैं, क्योंकि उन्हें विवाद या अप्रत्याशित प्रतिक्रिया का डर रहता है। इसी संदर्भ में लेखक एक उदाहरण देते हैं, जिसमें एक व्यक्ति ने सड़क पर घरेलू हिंसा रोकने का प्रयास किया, लेकिन पीड़ित महिला ने ही हस्तक्षेप करने पर आपत्ति जताई। लेखक इसे सामाजिक उदासीनता और बदलते व्यवहार का उदाहरण मानते हैं।
बच्चे सीख रहे हैं अभद्र भाषा
लेख में चिंता व्यक्त की गई है कि बच्चे केवल सार्वजनिक स्थानों पर ही नहीं, बल्कि घर, बाजार, बस, ट्रेन और मोबाइल फोन पर होने वाली बातचीत से भी अभद्र भाषा सीख रहे हैं। कई अभिभावक यह मानकर चलते हैं कि उनके बच्चे इन शब्दों को न तो समझते हैं और न ही उनका प्रयोग करते हैं, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है।
लेखक के अनुसार आज विद्यालयों में पढ़ने वाले अनेक बच्चे गाली-गलौज से परिचित हैं और अपने मित्रों के बीच उसका उपयोग भी करते हैं। स्टैंड-अप कॉमेडी, सोशल मीडिया और वायरल वीडियो इस प्रवृत्ति को और अधिक सामान्य बना रहे हैं।
सार्वजनिक आंदोलनों की बदलती भाषा
लेख में कहा गया है कि स्वतंत्रता संग्राम, किसान आंदोलनों, श्रमिक संघर्षों और छात्र आंदोलनों के दौरान लगाए जाने वाले नारे समाज को प्रेरित करने वाले, सकारात्मक और गरिमामय होते थे। वे लोगों में ऊर्जा, आशा और उद्देश्य का संचार करते थे।
इसके विपरीत लेखक का मत है कि हाल के वर्षों में विशेषकर युवाओं के कुछ आंदोलनों में अश्लील, अपमानजनक और अभद्र भाषा का प्रयोग बढ़ा है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और अधिक बढ़ावा दिया है। लेखक का कहना है कि कई बार कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले पुलिसकर्मियों और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए भी अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है, जिसे उन्होंने चिंताजनक बताया है।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से गाली-गलौज
लेख में समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि लगभग प्रत्येक समाज में अपमानजनक शब्दों का अपना एक शब्दकोश होता है। अनेक गालियाँ पारिवारिक संबंधों, महिलाओं, यौन व्यवहार या निजी जीवन से जुड़ी होती हैं और इन्हें सामाजिक रूप से वर्जित माना जाता है।
लेखक का तर्क है कि भारत जैसे पारंपरिक समाज में विवाह संस्था को विशेष महत्व दिया जाता है। इसलिए ऐसे शब्द, जो स्त्री, परिवार या यौन संबंधों का अपमानजनक संदर्भ देते हैं, सामाजिक रूप से अधिक आपत्तिजनक माने जाते हैं।
लोकतांत्रिक विरोध और भाषा की मर्यादा
लेखक स्पष्ट करते हैं कि प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाएँ गंभीर हैं और उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई आवश्यक है। नागरिकों को लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने का पूरा अधिकार है। लेकिन उनका मत है कि विरोध की भाषा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना उसका उद्देश्य।
लेख के अनुसार किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की प्रभावशीलता उसकी शालीनता, तार्किकता और नैतिक आधार पर निर्भर करती है। यदि विरोध प्रदर्शन अभद्र भाषा और व्यक्तिगत अपमान तक सीमित हो जाएँ, तो इससे आंदोलन का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है और समाज में गलत संदेश जा सकता है।
समाज और शिक्षा के लिए चेतावनी
लेख के अंत में लेखक ने चेतावनी दी है कि यदि सार्वजनिक जीवन में बढ़ती गाली-गलौज और अशिष्ट भाषा की प्रवृत्ति पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो इससे सामाजिक शिष्टाचार, पारिवारिक संस्कार और सभ्यता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही यह कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द के लिए भी नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है।
लेखक का निष्कर्ष है कि प्रश्नपत्र लीक जैसी समस्याओं के समाधान के साथ-साथ भारत की शिक्षा व्यवस्था में मूल्यपरक शिक्षा, नैतिक विकास और सामाजिक जिम्मेदारी को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए, ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग गरिमा और जिम्मेदारी के साथ कर सकें।