नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बालक सेना – एक अनसुना अध्याय
भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) या आजाद हिंद फौज का इतिहास भारतीय स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में प्रमुखता से नहीं पढ़ाया जाता। स्वतंत्रता के कई दशकों बाद भी आईएनए के पूर्व सैनिकों को औपचारिक रूप से स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा मिला और उन्हें पेंशन दी गई। आईएनए की सबसे कम उम्र की इकाई थी बालक सेना – जिसमें 10 से 15 वर्ष के बच्चों को शामिल किया गया था। इनमें से कुछ की आयु मात्र 12 वर्ष थी। इन बच्चों को तीन महीने का सैन्य प्रशिक्षण दिया गया, हिंदी सिखाई गई और उनमें देशभक्ति की भावना जगाई गई। लगभग 46 किशोरों को जापान भेजकर विशेष प्रशिक्षण दिया गया, जिन्हें टोक्यो कैडेट्स कहा जाता था। जापान की हार के बाद उन्हें समय से पहले वापस भेज दिया गया।
बालक सेना को प्रेरित करने वाले प्रमुख लोग
बालक सेना के बच्चों को प्रेरित करने में कई व्यक्तियों और घटनाओं की भूमिका रही:
- नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आह्वान
- नेताजी का नारा “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” ने न केवल वयस्कों, बल्कि बच्चों में भी जोश भरा।
- नेताजी ने स्वयं बालक सेना के प्रशिक्षुओं को संबोधित किया और उनकी परेड में शामिल होकर उन्हें प्रेरित किया।
- एक पूर्व कैडेट जयराज सी. राजाराव (अब 94 वर्ष) के अनुसार, पासिंग-आउट परेड में नेताजी ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले बच्चों को माला पहनाई। राजाराव ने लिखा कि उन्होंने राइफल के साथ सलामी दी और नारे लगाए—“नेताजी की जय, इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता की जय, चलो दिल्ली”—और सभी ने दोहराया। यह क्षण उनके लिए जीवन भर प्रेरणादायक रहा।
- पेनांग फ्री स्कूल के शिक्षक मैथ्यूज
- मलेशिया के पेनांग फ्री स्कूल में पढ़ने वाले जयराज सी. राजाराव (तब 12-13 वर्ष) को उनके शिक्षक मैथ्यूज ने बालक सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।
- मैथ्यूज ने उनकी क्षमता को पहचाना और उन्हें सैन्य प्रशिक्षण के लिए तैयार किया।
- 1944 में राजाराव ने पेनांग फ्री स्कूल परिसर में अन्य आईएनए स्वयंसेवकों के साथ प्रशिक्षण लिया।
- मलाया में बसे भारतीय प्रवासी और परिवार
- मलाया (वर्तमान मलेशिया) में बसे भारतीय परिवारों के बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।
- इन परिवारों में सांस्कृतिक जड़ें गहरी थीं—माता-पिता और दादा-दादी से सुनी स्वतंत्रता की कहानियां बच्चों में राष्ट्रवाद जगाती थीं।
- कई बच्चे दूर देश में रहते हुए भी भारत को केवल कहानियों से जानते थे, फिर भी नेताजी के आह्वान पर सैन्य प्रशिक्षण के लिए तैयार हो गए।
बालक सेना का प्रशिक्षण और उद्देश्य
- तीन महीने का आवासीय प्रशिक्षण।
- बुनियादी सैन्य शिक्षा।
- हिंदी भाषा सिखाई गई।
- देशभक्ति और भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने का उद्देश्य जगाया गया।
- नेताजी की परेड में शामिल होकर बच्चों को सम्मानित किया गया।
आज का संदर्भ: जयराज सी. राजाराव से मुलाकात
लेखक देवेंद्र कुमार बुडाकोटी ने कुआलालंपुर में 94 वर्षीय पूर्व कैडेट जयराज सी. राजाराव से मुलाकात की। राजाराव ने अपनी पुस्तक My Odyssey – Revolutionary & Evolutionary में अनुभव साझा किए। लेखक ने उन्हें उत्तराखंडी टोपी भेंट की। राजाराव ने बताया कि बालक सेना में शामिल होने का निर्णय उन्होंने सहर्ष लिया और नेताजी से मिलकर जो प्रेरणा मिली, वह जीवन भर उनके साथ रही।
प्रेरणा की गहरी जड़ें
बालक सेना के बच्चों को प्रेरित करने में सबसे बड़ा हाथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस का था, जिनका आह्वान और व्यक्तिगत संबोधन बच्चों में जोश भरता था। स्थानीय शिक्षक जैसे मैथ्यूज और परिवारों की सांस्कृतिक जड़ों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये बच्चे दूर देशों में रहते हुए भी भारत की स्वतंत्रता के लिए तैयार हुए—यह सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रवाद की गहरी जड़ों का प्रमाण है।