उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में “भूतिया गांवों” की बढ़ती समस्या: विकास की विफलताओं का कड़वा सच

देहरादून, 05 अक्टूबर 2025 उत्तराखंड के दुर्गम पर्वतीय गांवों में “भूतिया गांवों” का संकट अब एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। समाजशास्त्री देवेंद्र कुमार बुडाकोटी ने अपने विश्लेषण में चेतावनी दी है कि यह समस्या केवल सतही आंकड़ों या जंगली जानवरों पर दोषारोपण से हल नहीं होगी। बल्कि, यह पर्वतीय विकास मॉडल की मूलभूत कमियों, बुनियादी ढांचे की कमी और आर्थिक अवसरों के अभाव का परिणाम है। 1970 के दशक से शुरू हुए पलायन ने आज पूरे क्षेत्र को वीरान कर दिया है, जहां एक बार हंसी-खुशी से गूंजने वाले गांव अब सन्नाटे में डूबे हैं। बुडाकोटी के अनुसार, राज्य गठन के 18 वर्ष बाद भी सड़कें, बिजली, पानी और शिक्षा जैसी सुविधाओं की कमी ने लोगों को मैदानी इलाकों और शहरों की ओर धकेल दिया है। अब जब सुधार हो रहे हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी है—परिवार शहरों में बस चुके हैं और वापसी का सपना टूट चुका है।

पर्वतीय विकास का काला अध्याय: मनी ऑर्डर अर्थव्यवस्था से पेंशनधारी पीढ़ी तक

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जड़ें पारंपरिक कृषि, वन उत्पादों और पशुपालन में रची-बसी थीं। लेकिन 1970 के दशक की शुरुआत से ही “मनी ऑर्डर अर्थव्यवस्था” का दौर शुरू हो गया, जब लोग शहरों में नौकरियां कर पैसे भेजने लगे। बुडाकोटी के अनुसार, यह दौर ग्रामीण विकास योजनाओं की असफलता का प्रमाण था। 1980 के दशक तक जनगणना के आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि सड़कें, संचार, पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य सेवाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें पहाड़ों में पहुंच ही नहीं पाईं।

इसके परिणामस्वरूप, लोग बेहतर अवसरों की तलाश में स्थायी रूप से पलायन करने लगे। 1980-90 के दशक में यह प्रवृत्ति तेज हुई, जब “पुल फैक्टर” (शहरी आकर्षण) ने लोगों को मैदानों और शहरों की ओर खींचा। लेकिन 1990 के बाद “पुश फैक्टर” (गांवों में अवसरों की कमी) हावी हो गया। आज “पेंशनधारी पीढ़ी” के विवाहित बच्चे शहरों में बस चुके हैं, और गांवों में केवल यादें बाकी हैं। बुडाकोटी कहते हैं, “जब हर जरूरत बाजार से पूरी होने लगी, तो पहाड़ी जीवन का क्या औचित्य? महिलाओं पर सबसे ज्यादा बोझ था, जो अब शहरों में राहत महसूस कर रही हैं।”

कृषि और आजीविका का पतन: हरित क्रांति का छूटा मौका

पर्वतीय कृषि कभी भी राष्ट्रीय स्तर की हरित क्रांति का हिस्सा नहीं बन सकी। बुडाकोटी के विश्लेषण के अनुसार, इसका मुख्य कारण भूमि का छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटा होना और चकबंदी (भूमि समेकन) का न होना था। नकदी फसलें, बागवानी या कृषि-आधारित उद्योग कभी विकसित नहीं हुए। पारंपरिक खेती केवल जीविका स्तर की रही, जो खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित नहीं कर पाई।

वहीं, मैदानी क्षेत्रों में बाजारों, कृषि मंडियों, सहकारी संस्थाओं और मूल्य संवर्धन से ग्रामीण आय बढ़ी। डेयरी, पोल्ट्री और बकरी पालन जैसी गतिविधियां शहरी मांग से जुड़ीं। लेकिन पहाड़ों में यह विकास कभी नहीं पहुंचा। “कृषि अधिशेष की कमी ने गांवों को गरीबी के जाल में फंसा दिया,” बुडाकोटी ने कहा। जंगली जानवरों (सुअर, बंदर) को फसल नुकसान का बहाना बनाना गलत है—पलायन इससे बहुत पहले शुरू हो चुका था।

पर्यटन और प्रशासनिक विफलता: अवसरों का अपव्यय

राज्य गठन से पहले ही पर्वतीय क्षेत्रों में धार्मिक पर्यटन विकसित हो चुका था, लेकिन यह स्थानीय लोगों को पर्याप्त रोजगार नहीं दे सका। बुडाकोटी के अनुसार, राज्य बनने के बाद राजधानी देहरादून (मैदान) में होने से सरकारी मशीनरी मैदानी इलाकों तक सिमट गई। नीतियां पहाड़ों की अनदेखी करती रहीं। पर्यटन को बढ़ावा मिला, लेकिन स्थानीय आजीविका इससे जुड़ नहीं सकी।

“नीतिगत बदलावों के दूरगामी प्रभाव नीति-निर्माताओं की समझ से परे रहे,” लेखक ने लिखा। आज भी, सड़कें, पुल, स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार हो रहा है, लेकिन पलायन रुका नहीं। “बहुत देर हो चुकी है; परिवार शहरों में बस चुके हैं, नई पीढ़ी पहाड़ी जीवन से अनजान है।”

“भूतिया गांवों” का वास्तविक चेहरा: पलायन की अनिवार्यता, वापसी का कोई रास्ता नहीं

आज उत्तराखंड के सैकड़ों गांव “भूतिया गांव” बन चुके हैं—जहां केवल सन्नाटा और खंडहर बाकी हैं। बुडाकोटी के अनुसार, यह समस्या जंगली जानवरों या फसल नुकसान से नहीं, बल्कि विकास की विफलता से उपजी है। पलायन की शुरुआत 1950-60 के दशक से हुई, जब बाहर रहने वाले लोग आदर्श बने। लेकिन अब यह मजबूरी है।

“पुरानी पीढ़ी भी शहरी सुविधाओं की आदी हो चुकी है; वापसी का सपना टूट चुका है,” उन्होंने कहा। नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों में ये गांव जीवित हैं, लेकिन वास्तविकता कठोर है। लेखक ने व्यंग्यात्मक नोट पर समाप्त किया: “उत्तराखंड—देवभूमि! रहने दीजिए जैसी स्थिति है।”

समाधान की राह: नीतिगत सुधार और सामूहिक जागरूकता की जरूरत

बुडाकोटी ने सुझाव दिया कि भूमि समेकन, कृषि आधुनिकीकरण और स्थानीय आजीविका को प्राथमिकता दी जाए। पर्यटन को स्थानीय-केंद्रित बनाएं, ताकि पलायन रुके। “विकास समाजशास्त्र की समझ से नीतियां बनें, तभी पहाड़ जीवित रहेंगे,” उन्होंने कहा।

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