ताइपिंग वॉर कब्रिस्तान में उत्तराखंड के शहीदों की स्मृति
मलेशिया के पेराक राज्य में स्थित ताइपिंग कॉमनवेल्थ वॉर कब्रिस्तान की यात्रा के दौरान लेखक देवेंद्र कुमार बुडाकोटी और स्वागता सिन्हा रॉय ने उन भारतीय सैनिकों की याद को ताजा किया, जो द्वितीय विश्व युद्ध के मलाया अभियान में शहीद हुए, घायल हुए या युद्धबंदी (POWs) बने। इनमें से कई सैनिक उत्तराखंड (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) से थे और बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में गठित आईएनए (आजाद हिंद फौज) का हिस्सा बने। ताइपिंग कब्रिस्तान में आज भी रॉयल गढ़वाल राइफल्स के प्रतीक वाले सफेद ग्रेनाइट शिलालेख सैनिकों की वीरता और बलिदान की गवाही देते हैं। यह कब्रिस्तान मित्र राष्ट्रों के उन सैनिकों का अंतिम विश्राम स्थल है, जो 1941-42 के मलाया अभियान में जापानी सेना से लड़ते हुए शहीद हुए।
मलाया अभियान का संक्षिप्त इतिहास: ब्रिटिश मलाया की रक्षा और भारतीय सेना की भूमिका
1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के साथ ही ब्रिटिशों ने मलाया कमांड को मजबूत किया। ब्रिटिश मलाया (वर्तमान मलेशिया और सिंगापुर) की रक्षा के लिए भारतीय सेना की बड़ी तादाद तैनात की गई। इसमें शामिल थे:
- रॉयल गढ़वाल राइफल्स की दूसरी और पांचवीं बटालियन।
- कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन (तत्कालीन 4/19 हैदराबाद रेजिमेंट)।
दिसंबर 1941 में जापानी सेना ने मलाया पर आक्रमण किया। अपर्याप्त तैयारी, रसद की कमी और भारी विरोध के बावजूद भारतीय सैनिकों ने साहस दिखाया। जनवरी 1942 में गढ़वाल राइफल्स की नवगठित पांचवीं बटालियन भी शामिल हुई। अभियान में भारी क्षति हुई—अनेक सैनिक शहीद हुए, घायल हुए या युद्धबंदी बने।
युद्धबंदी और आईएनए का गठन: उत्तराखंड के सैनिकों की भूमिका
मलाया अभियान में बंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों में उत्तराखंड के सैनिकों की संख्या उल्लेखनीय थी। इनमें से बहुत से सैनिक बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में गठित आजाद हिंद फौज (आईएनए) में शामिल हुए। मलाया में बसे भारतीय प्रवासियों के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर इन सैनिकों ने आजाद हिंद फौज की रीढ़ तैयार की। यह दौर भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण अध्याय है, जहां ब्रिटिश सेना के सैनिक ही ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लड़ने लगे।
ताइपिंग वॉर कब्रिस्तान: शहीदों की स्मृति
ताइपिंग कब्रिस्तान दो भागों में बंटा है:
- ईसाई सैनिकों के लिए — क्रॉस ऑफ सैक्रिफाइस।
- गैर-ईसाई सैनिकों के लिए — स्टोन ऑफ रिमेम्ब्रेंस।
यहां 500 से अधिक अज्ञात सैनिकों को रेजिमेंटल प्रतीकों वाले सफेद ग्रेनाइट शिलालेखों से याद किया गया है। लेखकों ने देखा कि एक पंक्ति में चार शिलालेख रॉयल गढ़वाल राइफल्स के प्रतीक के साथ थे, जिन पर अंकित था:
“भारतीय सेना का एक सैनिक, 1939–1945, रॉयल गढ़वाल राइफल्स, जून 1943।”
कब्रिस्तान की शांति और स्वच्छता ने युद्ध की करुणा को और गहरा कर दिया।
उत्तराखंड का सामाजिक इतिहास: युद्ध में भागीदारी और आज की पीढ़ी
लेखक बताते हैं कि उस समय उत्तराखंड के पुरुष दुनिया के विभिन्न हिस्सों में युद्ध लड़ने जाते थे, जबकि गांवों में अधिकांश महिलाएं कभी घर से बाहर भी नहीं निकलती थीं। आज दुनिया देखने की आकांक्षा सार्वभौमिक हो चुकी है। यह बदलाव उत्तराखंड के सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
लेखकों के बारे में
- देवेंद्र कुमार बुडाकोटी एक समाजशास्त्री हैं।
- डॉ. स्वागता सिन्हा रॉय मलेशिया की विश्वविद्यालय यूटीएआर में अध्यापन करती हैं।