स्वतंत्र भारत की राजनीतिक भाषा में ‘माई-बाप सरकार’ शब्द एक ऐसा प्रतीक बन चुका है जो आशा और निराशा दोनों का मिश्रण है। चुनावी मंचों पर पार्टियां बेरोजगारी मिटाने, गरीबी उन्मूलन और महंगाई पर काबू पाने के वादे बांटती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है। समाजशास्त्री देवेंद्र कुमार बुड़ाकोटी के लेख से प्रेरित होकर यह विश्लेषण बताता है कि कैसे औपनिवेशिक काल से चली आ रही ‘सरकारी पालनहार’ की अवधारणा आज भी करोड़ों भारतीयों को जन्म से मृत्यु तक निर्भरता के बंधन में जकड़े हुए है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में भारत की बहुआयामी गरीबी दर 11.28% रह गई, लेकिन बेरोजगारी 7.45% और महंगाई की मार से मध्यम वर्ग भी गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिया गया। क्या यह ‘माई-बाप’ अब बोझ बन गई है, या फिर सुधार की उम्मीद बाकी है?
ऐतिहासिक जड़ें: ब्रिटिश राज से समाजवादी सपनों तक
भारतीय इतिहास में ‘माई-बाप सरकार’ की अवधारणा ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से उपजी है, जहां सरकार को जनता का स्वामी माना जाता था। नौकरियां, गरीबी हटाओ या महंगाई नियंत्रण जैसी चिंताएं शासन की प्राथमिकता नहीं थीं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्रता आंदोलन ने जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकारों को मंच दिया। समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधाराओं ने भूमि सुधार, सार्वजनिक सेवाओं पर सरकारी नियंत्रण और भूखमरी उन्मूलन की बात की।
स्वतंत्रता के बाद नेहरू युग में सोवियत मॉडल से प्रेरित पंचवर्षीय योजनाओं ने समाजवादी विकास को बढ़ावा दिया। भारी उद्योग, बुनियादी ढांचा और शैक्षिक संस्थानों में सरकारी निवेश ने ‘सरकारी नौकरी’ की संस्कृति को जन्म दिया। नेहरू ने इन्हें ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने ट्रेड यूनियन, इतिहास लेखन और पत्रकारिता को प्रभावित किया, जिससे ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट’ विमर्श मजबूत हुआ। लेकिन 1991 की आर्थिक उदारीकरण नीति ने लाइसेंस राज समाप्त कर बाजार प्रतिस्पर्धा बढ़ाई। नीति आयोग के पूर्व अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने कहा, “समाजवाद की विरासत नौकरशाही, राजनीति और बुद्धिजीवियों में बनी हुई है।” आज भी कांस्टेबल या चपरासी की नौकरियों के लिए एमबीए और पीएचडी धारक आवेदन करते हैं, जो निजी क्षेत्र की कमियों को उजागर करता है।
वर्तमान चुनौतियां: बेरोजगारी, महंगाई और गरीबी का त्रिकोण
आजादी के 75 वर्ष बाद भी ‘माई-बाप सरकार’ की अवधारणा जीवित है, लेकिन यह गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई के संकट को हल करने में असफल साबित हो रही है। मूड ऑफ द नेशन सर्वे के अनुसार, 25.9% लोग बेरोजगारी को, 19.3% महंगाई को और 7.4% गरीबी को मोदी सरकार की प्रमुख समस्या मानते हैं। 2023 में बेरोजगारी दर 7.45% पहुंच गई, जिससे 33 मिलियन लोग प्रभावित हुए। बढ़ती जनसंख्या, शिक्षा-कौशल की कमी और भ्रष्टाचार मुख्य कारण हैं।
महंगाई ने पेट्रोल से लेकर आटा-चावल तक की कीमतें आसमान छू लीं। 2014 के ‘बहुत हुई महंगाई की मार’ नारे के बावजूद, मोदी सरकार के 9 वर्षों में मुद्रास्फीति बेतहाशा बढ़ी। कोरोना के बाद 3.3 करोड़ मध्यम वर्गीय लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए। विश्व बैंक के अनुसार, 2023-24 में ग्रामीण गरीबी रेखा 1632 रुपये और शहरी 1944 रुपये प्रतिमाह है। बढ़ती आबादी संसाधनों पर दबाव डाल रही है, जिससे छिपी बेरोजगारी (कृषि क्षेत्र में) और मौसमी बेरोजगारी आम हो गई।
राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेता इसे ‘मित्रों की कमाई बढ़ाने’ का आरोप लगाते हैं, जबकि तेजस्वी यादव भाजपा शासन में बेरोजगारी-महंगाई को नीतिगत विफलता बताते हैं। शिक्षा पाठ्यक्रम रोजगार-उन्मुख न होने से युवा सरकारी नौकरियों पर निर्भर हैं, जो निजी क्षेत्र की तुलना में वेतन-भत्तों में बेहतर हैं।
सरकारी प्रयास: कल्याण योजनाओं का जाल और उनकी सीमाएं
‘माई-बाप सरकार’ की भावना से प्रेरित होकर सरकार ने जन्म से मृत्यु तक कवर करने वाली योजनाएं चलाईं। एकीकृत बाल विकास योजना (ICDS), मध्याह्न भोजन, मनरेगा, पेंशन योजनाएं (विधवा, वृद्धावस्था, विकलांग), सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), मुफ्त राशन-गैस, आवास-शौचालय, जन धन खाते से डीबीटी और विवाह/दाह संस्कार सहायता जैसी स्कीम्स गरीबों को जोड़ती हैं।
इनसे बहुआयामी गरीबी 2013-14 के 29.17% से घटकर 2022-23 में 11.28% हो गई। लेकिन आलोचक कहते हैं कि ये ‘फ्रीबीज कल्चर’ को बढ़ावा देती हैं, जो महंगाई और बेरोजगारी को जन्म देती हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “हमारी सरकार ‘माई-बाप’ नहीं, बल्कि सेवा करने वाली है।” फिर भी, कौशल विकास और उद्यमिता पर जोर कम होने से समस्या बरकरार है।
आगे की राह: निर्भरता से स्वावलंबन की ओर
‘माई-बाप सरकार’ की अवधारणा वैचारिक बहस का विषय है—क्या यह कल्याणकारी है या निर्भरता बढ़ाने वाली? विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा सुधार, कौशल प्रशिक्षण, निजी निवेश बढ़ाना और जनसंख्या नियंत्रण आवश्यक हैं। भ्रष्टाचार रोकने के लिए पारदर्शिता और डिजिटल गवर्नेंस को मजबूत करें। यदि सरकार ‘सेवक’ बनेगी, न कि ‘पालनहार’, तो भारत गरीबी-बेरोजगारी से मुक्त हो सकता है। लेकिन चुनावी वादों से आगे बढ़कर ठोस नीतियां ही असली बदलाव लाएंगी।
-देवेन्द्र कुमार बुड़ाकोटी