जौनसार क्षेत्र में फैला अवैध आरक्षण का जाल
देहरादून, आजखबर।। आरटीआई कार्यकर्ता और एडवोकेट विकेश सिंह नेगी ने एक चौंकाने वाले खुलासे के माध्यम से जौनसार क्षेत्र में व्याप्त आरक्षण घोटाले को सामने लाया है। उनके अनुसार, यह क्षेत्र अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा प्राप्त करने से कोसों दूर है, फिर भी ब्राह्मण, राजपूत और खस्याओं जैसी ऊपरी जातियों को गैरकानूनी तरीके से एसटी प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं। नेगी का दावा है कि स्थानीय नेताओं ने जनता को गुमराह कर इस धोखे को अंजाम दिया, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान राज्य के बेरोजगार युवाओं को हो रहा है। सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों के हक पर यह साफ डाका है, और नेगी ने इसे राजनीतिक साजिश करार दिया है। उन्होंने दस्तावेजी सबूत पेश कर कहा कि यह सब राष्ट्रपति के स्पष्ट आदेशों का खुला उल्लंघन है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: लोकुर समिति की रिपोर्ट और 1967 का राष्ट्रपति आदेश
एडवोकेट विकेश नेगी ने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जौनसार को कभी भी अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं मिला। 1965 में भारत सरकार ने सामाजिक कल्याण मंत्रालय के तहत बी.एन. लोकुर की अध्यक्षता में एक विशेष समिति का गठन किया था, जिसे लोकुर समिति के नाम से जाना जाता है। इस समिति का मुख्य उद्देश्य 1950 के राष्ट्रपति आदेशों (अनुसूचित जाति और जनजाति संबंधी) की समीक्षा करना था, ताकि विभिन्न जातियों और जनजातियों को सूची में शामिल या बाहर करने का निर्णय लिया जा सके। समिति ने भौगोलिक स्थिति, सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक विशेषताओं और आर्थिक हालातों के आधार पर विश्लेषण किया।
उत्तर प्रदेश (जिसमें तत्कालीन उत्तराखंड भी शामिल था) के संदर्भ में समिति ने पाया कि यहां अनुसूचित जनजातियों की संख्या बेहद सीमित है। अधिकांश आबादी सामान्य जातियों में वर्गीकृत थी, इसलिए केवल कुछ चुनिंदा जनजातियों को ही मान्यता देने की सिफारिश की गई। इसके परिणामस्वरूप, 24 जून 1967 को राष्ट्रपति द्वारा जारी आदेश में उत्तर प्रदेश (उत्तराखंड सहित) के लिए मात्र पांच जनजातियों—भोटिया, बुक्सा, जनसारी, राजी और थारू—को अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया। नेगी ने जोर देकर कहा कि राजस्व अधिकारी केवल इन्हीं पांच जातियों को प्रमाणपत्र जारी करने के लिए अधिकृत हैं, और जौनसार क्षेत्र को इसमें शामिल नहीं किया गया।
उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद की स्थिति: एसटी सूची में कोई बदलाव नहीं
2000 में उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद भी अनुसूचित जनजातियों की सूची वही रही, जो उत्तर प्रदेश में लागू थी। यानी, राज्य में आज भी केवल वही पांच जनजातियां एसटी के रूप में मान्यता प्राप्त हैं। नेगी ने बताया कि बाद में केंद्र सरकार की विभिन्न समितियों, जैसे 2002 के कर्मा आयोग और सामाजिक न्याय मंत्रालय की सिफारिशों ने सूची के विस्तार पर विचार तो किया, लेकिन बिना संसद द्वारा संविधान (अनुसूचित जनजातियां) आदेश में संशोधन के कोई नई जाति या उपजाति को शामिल नहीं किया जा सकता। किसी क्षेत्र या जाति को एसटी का दर्जा देने के लिए संसद में विधेयक पारित होना अनिवार्य है, उसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिलती है। नेगी ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के जौनसार को एसटी क्षेत्र घोषित करने की कोशिश की, जो पूरी तरह असंवैधानिक है।
ब्राह्मण, राजपूत और खस्याओं का अनुचित लाभ: गैरकानूनी प्रमाणपत्रों का मुद्दा
राष्ट्रपति के 1967 के आदेश में साफ तौर पर उल्लेख है कि जौनसार क्षेत्र में ब्राह्मण, राजपूत और खस्याओं को छोड़कर केवल अन्य जनसारी जाति को ही एसटी लाभ मिल सकता है। लेकिन नेगी के अनुसार, आदेश में ‘जांसार’ शब्द की टाइपिंग त्रुटि को आधार बनाकर इसे ‘जौनसारी’ कर लिया गया, और अब पूरे क्षेत्र के लोग इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। यह पूरी तरह से गैरकानूनी है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को स्वतंत्र रूप से किसी क्षेत्र को एसटी घोषित करने का कोई अधिकार नहीं; इसके लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजना पड़ता है, जो संसद से पारित होकर राष्ट्रपति तक पहुंचे। जौनसार के नेता वर्षों से जनता को इस भ्रम में रखे हुए हैं, जिससे ऊपरी जातियों को सरकारी नौकरियों और आरक्षण में अनुचित लाभ मिल रहा है।
नेगी का तर्क है कि 1967 के बाद कोई नया अध्यादेश जारी नहीं हुआ, न ही संसद में एसटी क्षेत्र संबंधी कोई विधेयक पारित हुआ। संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत शेड्यूल 5 और 6 में भी उत्तराखंड को एसटी दर्जा नहीं दिया गया। इसलिए, जौनसार में ब्राह्मणों और स्वर्ण राजपूतों को जारी हो रहे सभी प्रमाणपत्र अवैध हैं। इसका सीधा असर सामान्य श्रेणी के योग्य उम्मीदवारों पर पड़ रहा है, जो आरक्षण के नाम पर वंचित हो रहे हैं। नेगी ने इसे नेताओं की राजनीतिक चाल बताया, जिसमें वे वोट बैंक मजबूत करने के लिए जनता को गुमराह कर रहे हैं।
सरकारी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन: 1982 की पुस्तिका और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया
भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग, गृह मंत्रालय द्वारा 1982 में जारी एक ब्रोशर में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण संबंधी विस्तृत दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इसमें स्पष्ट है कि प्रमाणपत्र केवल राज्य सरकार द्वारा नामित सक्षम प्राधिकारियों (जैसे उपजिलाधिकारी या तहसीलदार) द्वारा जारी किए जा सकते हैं। जारी करने से पहले आवेदक की जाति राजस्व रिकॉर्ड या अन्य प्रमाणिक दस्तावेजों में सत्यापित होनी चाहिए। राजस्व अधिकारियों (लेखपाल, पटवारी आदि) की जिम्मेदारी है कि वे अभिलेखों की जांच करें और केवल राष्ट्रपति की अधिसूचना में उल्लिखित जाति/जनजाति के स्थायी निवासियों को ही प्रमाणपत्र दें। यदि कोई व्यक्ति दूसरे राज्य में रहता है, तो केवल तभी एसटी माना जाएगा यदि उस राज्य की सूची में नाम हो।
नेगी ने दुर्भाग्य व्यक्त किया कि उत्तराखंड में इन दिशा-निर्देशों का कोई पालन नहीं हो रहा। उन्होंने केंद्र सरकार के संसदीय जवाबों का हवाला दिया—2003 और 2022 में लोकसभा में पूछे गए प्रश्नों (जैसे 12 दिसंबर 2022 का प्रश्न संख्या 786) में स्पष्ट किया गया कि पूरे देश में 700 से अधिक एसटी जनजातियां हैं, लेकिन उत्तराखंड में केवल भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू ही मान्य हैं। कोई नई प्रविष्टि नहीं हुई, और जौनसार को एसटी क्षेत्र का दर्जा नहीं है। 2003 के सवाल में भी यही पुष्टि हुई कि राज्य में कोई अनुसूचित जनजाति क्षेत्र नहीं है। इसलिए, ब्राह्मणों और क्षत्रियों को आरक्षण लाभ देना पूरी तरह गलत है।
राजनीतिक ठगी का पर्दाफाश: नेगी की चेतावनी और आगे की कार्रवाई
एडवोकेट विकेश सिंह नेगी ने इस पूरे प्रकरण को एक बड़ी राजनीतिक ठगी करार दिया। उनके अनुसार, जौनसार के नेताओं ने स्थानीय जनता को धोखा देकर सत्ता हासिल की, जबकि राज्य के अन्य योग्य युवाओं को सरकारी नौकरियों से दूर रखा। जौनसार को एसटी क्षेत्र कहना गलत है, और न ही इसे ऐसा दर्जा प्राप्त है। नेगी ने मांग की कि एसटी श्रेणी से प्राप्त नौकरियों की जांच हो, और वे योग्य अभ्यर्थियों को सौंपी जाएं। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी—हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक। साथ ही, जल्द ही संबंधित विभागों और केंद्र सरकार को शिकायत दर्ज कराई जाएगी, ताकि इस घोटाले की गहन जांच हो सके। नेगी का यह खुलासा राज्य की राजनीति में भूचाल ला सकता है, और बेरोजगार युवाओं के लिए एक नई उम्मीद जगा सकता है।