क्या भ्रष्टाचार मानव डीएनए में है?

देवेन्द्र कुमार बुडाकोटी

“भारत में बहुत भ्रष्टाचार है”—यह वाक्य अक्सर आम भारतीयों की ज़ुबान पर सुनाई देता है। अधिकांशत: इसका निशाना राज्य तंत्र और उसके अधिकारी होते हैं—चाहे वे ऊँचे पदों पर बैठे हों या निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी। राजनीति, नौकरशाही और यहाँ तक कि न्यायपालिका पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या भ्रष्टाचार केवल भारत की समस्या है, या यह एक वैश्विक प्रवृत्ति है?

भ्रष्टाचार का वैश्विक परिप्रेक्ष्य

विकसित देशों में प्रशासनिक प्रक्रियाएँ अपेक्षाकृत पारदर्शी और सरल मानी जाती हैं। जन्म, मृत्यु, विवाह प्रमाणपत्र, पहचान पत्र या पासपोर्ट जैसे सामान्य कार्य बिना रिश्वत के पूरे हो जाते हैं। वहीं भारत में यह धारणा बनी हुई है कि लगभग हर प्रकार का परमिट या प्रमाणपत्र अवैध भुगतान से हासिल किया जा सकता है—कभी-कभी तो विदेशी नागरिक भी, वैध या अवैध तरीके से, इसी रास्ते से लाभ उठा लेते हैं।

कानून और प्रवर्तन एजेंसियाँ मौजूद होते हुए भी भ्रष्टाचार कायम है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल अधिकारियों पर दोषारोपण करना पर्याप्त नहीं, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी ज़रूरी है।

समाज और व्यक्ति की भूमिका

हम प्रायः भ्रष्टाचार को केवल राज्य से जोड़कर देखते हैं और अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं।

  • छोटी-छोटी रिश्वतें,

  • नियमों की अनदेखी,

  • या अनुचित समझौते,

ये सब हमारी दैनिक आदतों में शामिल हो गए हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टि से भ्रष्टाचार सिर्फ़ संरचनात्मक समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक मान्यताओं, अपेक्षाओं और रोज़मर्रा की आदतों में गहराई से रचा-बसा है।

भ्रष्टाचार और अपराध का संबंध

भ्रष्टाचार को अक्सर सत्ता के दुरुपयोग और श्वेतपोश अपराध के रूप में देखा जाता है—जैसे रिश्वत, धन की हेरफेर और धोखाधड़ी। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है।

  • संगठित अपराध नेटवर्क भ्रष्टाचार का सहारा लेकर राजनीतिक और आर्थिक तंत्र में घुसपैठ करते हैं।

  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मानव तस्करी और मादक पदार्थ तस्करी जैसी गतिविधियों को जन्म देता है।

  • कई बार इसमें राज्य अधिकारियों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संलिप्तता भी सामने आती है।

दार्शनिक दृष्टिकोण : मानव स्वभाव और भ्रष्टाचार

राजनीतिक दार्शनिक—होब्स, लॉक और रूसो—ने सामाजिक अनुबंध सिद्धांत में मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया।

  • होब्स का मानना था कि मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी, भयभीत और सत्ता-साधक होता है।

  • आधुनिक लोकतंत्रों में भी ईर्ष्या, लालच और स्वार्थ जैसी प्रवृत्तियाँ बनी हुई हैं।

इसलिए भ्रष्टाचार केवल संस्थागत कमजोरी का परिणाम नहीं, बल्कि मानव स्वभाव का प्रतिबिंब भी हो सकता है।

समाधान : संरचना और आचरण दोनों में सुधार

भ्रष्टाचार वहाँ फलता-फूलता है जहाँ संस्थाएँ कमजोर हैं और समाज अनैतिक आचरण को सहन करता है। यदि नागरिक रोज़मर्रा के छोटे-छोटे भ्रष्टाचार को नकार देंगे—जैसे फाइल आगे बढ़ाने के लिए रिश्वत, अवैध छूट या अन्याय की अनदेखी—तो यह संस्कृति धीरे-धीरे टूट सकती है।

वास्तविक सुधार के लिए हमें यह स्वीकार करना होगा कि भ्रष्टाचार न केवल संस्थागत विफलता है, बल्कि यह हमारे दृष्टिकोण और व्यवहार में भी गहराई तक मौजूद है।

भ्रष्टाचार केवल कानूनों और नीतियों से नहीं मिटेगा, बल्कि इसके लिए नागरिकों की सोच और आचरण में बदलाव अनिवार्य है। यदि हम इसे सहन करते रहेंगे, तो सदा ही “स्वस्थ, धनी और बुद्धिमान लोग अंधेरे में चोरी करते रहेंगे और समाज असमानता तथा अन्याय की मार झेलता रहेगा।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *