आवारा कुत्तों की समस्या पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: राष्ट्रीय बहस का विषय बना स्थानीय मुद्दा

समस्या की गंभीरता

भारत दुनिया का वह देश है, जहाँ सबसे अधिक आवारा कुत्ते और बिल्लियाँ पाई जाती हैं। इसका सीधा असर सार्वजनिक स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। आंकड़ों के अनुसार, रेबीज से होने वाली वैश्विक मौतों का 36% भारत में होता है
यह केवल नगरपालिकाओं के लिए प्रशासनिक चुनौती नहीं है, बल्कि आम नागरिकों के जीवन और सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है।


कानून और टकराव की स्थिति

आवारा कुत्तों को लेकर भारत में कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।

  • पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960
  • एनिमल बर्थ कंट्रोल (कुत्ते) नियम, 2001

इन कानूनों के तहत कुत्तों को न मारने, न जबरन हटाने और न ही कहीं और स्थानांतरित करने की अनुमति है। इनका उद्देश्य पशुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। लेकिन यही प्रावधान अब आम जनता की सुरक्षा से टकराने लगे हैं, क्योंकि बढ़ते कुत्तों के झुंड और हमलों की घटनाएँ नागरिकों के लिए खतरा बनती जा रही हैं।


सुप्रीम कोर्ट का आदेश और विवाद

11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और एनसीआर की सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाकर शेल्टर में रखने का आदेश दिया।
लेकिन इस फैसले का व्यापक विरोध हुआ।

  • पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने तर्क दिया कि शेल्टर होम “यातना गृह” बन सकते हैं, जहाँ इन जानवरों की स्थिति और खराब हो सकती है।
  • विदेशी कार्यकर्ता फिलिप वोलन ने भी इस पर चिंता जताई और इसे अमानवीय बताया।
  • शहरी पालतू पशु प्रेमियों को डर था कि कहीं उनके घरों में पल रहे पालतू कुत्ते भी इस कार्रवाई की चपेट में न आ जाएँ।

विवाद बढ़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पर रोक लगा दी और अब यह मामला मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में तीन जजों की पीठ के पास विचाराधीन है।


शहरी और ग्रामीण दृष्टिकोण

लेख में यह भी सामने आया कि शहरी मध्यम वर्ग ने इस आदेश का सबसे ज़्यादा विरोध किया। उन्हें डर था कि उनके पालतू “रॉकी” जैसे कुत्ते भी इसमें शामिल हो जाएंगे।
इसके विपरीत ग्रामीण समाज, जहाँ ‘टॉमी’ जैसे कुत्ते पूरे गाँव का हिस्सा होते हैं और स्वतंत्र रूप से घूमते हैं, इस विवाद में लगभग गैर-शामिल रहा। यह विरोध और प्रतिक्रिया का फर्क हमारे सामाजिक ढाँचे और प्राथमिकताओं को दर्शाता है।


नागरिक समाज और व्यापक सवाल

यह विवाद केवल आवारा कुत्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि नागरिक समाज किस हद तक सक्रिय है।
शहरी मध्यम वर्ग ने मीडिया और न्यायालय के माध्यम से अपनी बात प्रभावी ढंग से रखी। लेकिन यही संवेदनशीलता यदि सड़क पर रहने वाले बच्चों, भिक्षावृत्ति, बेघर लोगों और सड़क सुरक्षा जैसे विषयों पर भी दिखाई दे, तो समाज का बड़ा भला हो सकता है।

लेखक का सुझाव है कि नागरिक समूहों को संस्थागत रूप दिया जाए, ताकि वे केवल जानवरों के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य सामाजिक मुद्दों पर भी सरकार और नीति-निर्माताओं तक अपनी आवाज़ पहुँचा सकें।

आवारा कुत्तों की समस्या स्थानीय निकायों द्वारा सुलझाई जानी चाहिए थी, लेकिन अब यह राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद अंतिम निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि देश किस प्रकार जानवरों की सुरक्षा और जनता की सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करता है।

यह पूरा प्रकरण इस बात की भी याद दिलाता है कि भारत एक ऐसा लोकतंत्र है जहाँ आवारा कुत्तों का मुद्दा भी सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ के सामने सुना जा रहा है।

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