पिथौरागढ़: मुनस्यारी के गांधीनगर में बीमार महिला को 10 किमी डोली में ढोया
पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी विकासखंड के गांधीनगर गांव में आजादी के 78 साल बाद भी सड़क नहीं पहुंची है। गांव के स्वतंत्रता सेनानी नरीराम का यह गांव आज भी स्वास्थ्य और सड़क सुविधा से वंचित है। हाल ही में गांव निवासी सरुली देवी (50) को अचानक पेट में तेज दर्द हुआ। गांव में कोई चिकित्सा सुविधा नहीं होने से ग्रामीणों ने डोली तैयार की।
- ग्रामीणों ने बीमार महिला को कंधों पर उठाकर 10 किलोमीटर की दुर्गम पहाड़ी पगडंडी से गुजारा।
- पहले मदकोट तक पहुंचाया, फिर 28 किमी दूर मुनस्यारी स्वास्थ्य केंद्र ले गए।
- बेहतर इलाज के लिए जिला अस्पताल भेजा गया।
ग्राम प्रधान तारा विश्वकर्मा ने बताया कि गांव में लगभग 250 परिवार रहते हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। पूर्व जिला पंचायत सदस्य जगत मर्तोलिया ने कहा कि कई बार धरना-प्रदर्शन हो चुके, लेकिन स्थिति नहीं बदली।
उत्तरकाशी: सटूड़ी-सांवणी गांव आज भी सड़क से कटे
उत्तरकाशी जिले की पंचगांई पट्टी के सटूड़ी और सांवणी गांव आज भी सड़क से वंचित हैं। यहां के 72 परिवार रूपिन नदी पर बनी जर्जर लकड़ी की पुलिया पर निर्भर हैं, जो बरसात में बह जाती है।
- ग्राम प्रधान सुरेंद्र रावत ने बताया कि 2014-15 में लोनिवि ने झूला पुल और सड़क का प्राक्कलन शासन को भेजा था।
- 2018 में मुख्यमंत्री ने खेड़ा से सटूड़ी-सांवणी तक 5 किमी मोटर मार्ग की घोषणा की।
- दो वर्ष पहले भूमि प्रतिकर भी वितरित किया गया, लेकिन निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ।
- पीएमजीएसवाई के कनिष्ठ अभियंता अनंतराम शर्मा ने कहा कि ग्रामीणों के अलग-अलग सुझाव (बैंचा पुल vs सुनकुंडी) के कारण प्राक्कलन तैयार कर शासन को भेजा गया है।
एआई के युग में डंडी-कंडी पर निर्भर स्वास्थ्य व्यवस्था
आज के डिजिटल और एआई युग में उत्तराखंड के सीमांत इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था अभी भी डंडी-कंडी (पालकी) पर टिकी है।
- पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी के ये गांव विकास से कोसों दूर हैं।
- सड़क न होने से आपात स्थिति में मरीजों को कंधों पर ढोना पड़ता है।
- ग्रामीणों का कहना है कि सड़क बनने से स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की दिशा में बड़ा बदलाव आएगा।
निष्कर्ष: घोषणाएं तो हुईं, लेकिन अमल का इंतजार
दोनों जिलों में सड़क निर्माण की घोषणाएं कई वर्ष पुरानी हैं, लेकिन कार्य शुरू नहीं हुआ। ग्रामीणों का सवाल है कि विकास की बातें तो होती हैं, लेकिन सीमांत क्षेत्रों तक पहुंच कब होगी?