कुदरत के प्रकोप ने छीनी कई जिंदगियां
देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 15-16 सितंबर 2025 की रात आई प्रलयंकारी बाढ़ और भूस्खलन ने पूरे क्षेत्र को हिला कर रख दिया। मॉनसून के अंतिम दिनों में कुदरत ने ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि कई परिवार उजड़ गए। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, देहरादून जिले में मृतकों की संख्या 24 तक पहुंच चुकी है, जबकि 17 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) और स्थानीय पुलिस की टीमें दिन-रात मलबे और नदियों में छिपे शवों की खोजबीन में जुटी हुई हैं। यह विपत्ति न केवल मानवीय क्षति का कारण बनी, बल्कि बुनियादी ढांचे को भी गहरा आघात पहुंचाया। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और अनियोजित निर्माण ने इस आपदा को और भयावह बना दिया। आइए, इस त्रासदी के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से नजर डालें।
आपदा का काला पन्ना: घटना की पूरी कथा
15 सितंबर की देर रात से शुरू हुई मूसलाधार बारिश ने सहस्त्रधारा, मालदेवता और प्रेमनगर जैसे इलाकों में बादल फटने जैसी स्थिति पैदा कर दी। सहस्त्रधारा क्षेत्र में मात्र 24 घंटों में 264 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जिससे सॉन्ग नदी उफान पर आ गई। नतीजा यह हुआ कि दुकानें, होटल, आवास और छोटे-मोटे व्यवसायिक प्रतिष्ठान बह गए। टोंस नदी के तेज बहाव में एक ट्रैक्टर-ट्रॉली सवार आठ मजदूर बह गए, जिनमें से अधिकांश उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के निवासी थे। इसी प्रकार, झजरा के पास आसन नदी में एक अन्य घटना में कई लोग लापता हो गए।
प्रारंभिक आंकड़े और मानवीय क्षति
आपदा के तुरंत बाद जारी आंकड़ों में चार मौतें और आठ लापता दर्ज किए गए थे। लेकिन जैसे-जैसे बचाव कार्य तेज हुए, मृतकों का सिलसिला बढ़ता गया। 16 सितंबर तक 13 शव बरामद हो चुके थे, जो 17 सितंबर तक 24 हो गए। राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र (एसईओसी) के अनुसार, देहरादून में 13 मौतें हुईं, जबकि पूरे उत्तराखंड में 15 तक पहुंच गईं। लापता लोगों की संख्या में भी उतार-चढ़ाव देखा गया—प्रारंभ में 16, अब 17। इनमें से कई पर्यटक, मजदूर और स्थानीय निवासी शामिल हैं। घायलों की संख्या तीन से अधिक बताई जा रही है, जिनका इलाज जारी है।
बचाव अभियान: एसडीआरएफ और पुलिस की अथक मशक्कत
आपदा के बाद तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हो गया। एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और अग्निशमन दलों ने जेसीबी, हेलीकॉप्टर और अन्य उपकरणों का सहारा लिया। पौंधा के एक वोकेशनल इंस्टीट्यूट में जलभराव से फंसे 200 छात्रों को सुरक्षित निकाला गया। इसी तरह, रिशिकेश के चंद्रभागा नदी से तीन लोगों को बचाया गया। कुल मिलाकर, 900 से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा चुका है।
चुनौतियां और निरंतर प्रयास
खराब मौसम और मलबे की भारी मात्रा ने बचाव कार्यों को कठिन बना दिया। फिर भी, टीमें 19 सितंबर तक सक्रिय रहीं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य आपदा संचालन केंद्र से स्थिति की निगरानी की और प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। उन्होंने कहा, “यह एक बड़ा संकट है, लेकिन हम पूरे सामर्थ्य से जुटे हैं।” स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों को छुट्टी घोषित कर दी गई, जबकि येलो अलर्ट 21 सितंबर तक जारी रहा।
बुनियादी ढांचे पर कहर: सड़कें, पुल और संपर्क मार्ग तबाह
इस आपदा ने देहरादून के यातायात नेटवर्क को चरमरा दिया। पांवटा साहिब हाईवे पर प्रेमनगर के पास एक पुल ध्वस्त हो गया, जिससे हिमाचल प्रदेश से कनेक्टिविटी पूरी तरह कट गई। देहरादून-मसूरी रोड कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त हो गया, लेकिन प्रशासन ने छोटे वाहनों के लिए इसे चालू कर दिया। लालटप्पड़ में हरिद्वार-देहरादून हाईवे को भारी नुकसान पहुंचा, हालांकि एक लेन से आवाजाही बहाल हो गई।
अन्य प्रभावित क्षेत्र
सहस्त्रधारा और मालदेवता में नदियों का उफान आया, जिससे तपकेश्वर मंदिर जैसे धार्मिक स्थल जलमग्न हो गए। जौनसार बावर की जीवनरेखा कालसी-चकराता मोटर मार्ग पूरी तरह बंद पड़ा है। जजरेड और चापनू मोड पर भूस्खलन से मलबा सड़कों पर फैल गया, जिससे विकासनगर-चकराता मार्ग पर लंबी वाहन जाम लग गई। कुल 13 पुल, 10 कल्वर्ट, 21 सड़कें, दो घर और 31 दीवारें क्षतिग्रस्त हुईं। नुकसान का अनुमान 10 करोड़ रुपये से अधिक है।
भविष्य की चिंताएं: जलवायु परिवर्तन और सबक
यह आपदा उत्तराखंड के लिए एक चेतावनी है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र की नाजुक भूगर्भीय संरचना और बढ़ते शहरीकरण ने बाढ़ को और घातक बना दिया। मॉनसून के अंतिम चरण में भी इतनी भारी वर्षा असामान्य है, जो जलवायु संकट का संकेत देती है। नदी किनारों पर 582 से अधिक अवैध बस्तियां बनी हुई हैं, जो बहाव को बाधित कर रही हैं। प्रशासन ने राहत कार्य तेज कर दिए हैं, लेकिन पुनर्वास और पुनर्निर्माण में वर्षों लग सकते हैं।
एकजुटता का आह्वान
देहरादून की यह त्रासदी पूरे देश को सोचने पर मजबूर करती है। मृतकों के प्रति गहन शोक व्यक्त करते हुए, हम आशा करते हैं कि लापता सभी सुरक्षित मिलें। एसडीआरएफ और पुलिस की बहादुरी सराहनीय है। इस संकट में एकजुट होकर उत्तराखंड फिर से खड़ा होगा। माँ भगवती की कृपा से सभी को शक्ति मिले।