आर्ट-क्राफ्ट प्रतियोगिता में बच्चों का शानदार प्रदर्शन
देहरादून, 14 अक्टूबर 2025: रीच संस्था द्वारा आयोजित विरासत महोत्सव-2025 में ओएनजीसी के डॉ. अंबेडकर स्टेडियम में स्कूली बच्चों ने आर्ट और क्राफ्ट प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया। लगभग 250 बच्चों ने विभिन्न स्कूलों से हिस्सा लिया, जिनमें ओलम्पस हाई स्कूल, दून इंटरनेशनल स्कूल, आर्मी पब्लिक स्कूल क्लेमेनटाउन, फिल्फोर्ट स्कूल, माउंटेसरी, श्री गुरु राम राय बालावाला, आशा ट्रस्ट, सेंट कबीर स्कूल और लतिका रॉय शामिल रहे। बच्चों ने हरियाली, पर्यावरण और अन्य थीम पर ड्राइंग और पेंटिंग के माध्यम से अपनी रचनात्मकता दिखाई। क्राफ्ट प्रतियोगिता में भी नन्हे हाथों ने अनोखे हुनर का प्रदर्शन कर दर्शकों की प्रशंसा बटोरी।
प्रतियोगिता में दून इंटरनेशनल स्कूल ने प्रथम और द्वितीय स्थान हासिल किया, जिसके लिए उन्हें सर्टिफिकेट से सम्मानित किया गया। 12 से 14 टीमों, प्रत्येक में 2 से 5 बच्चों ने भाग लिया, जिनमें 80 से अधिक आकस्मिक प्रतिभागियों ने आयोजन में उत्साह जोड़ा। यह प्रतियोगिता बच्चों की कला को बढ़ावा देने और उनकी रचनात्मकता को मंच प्रदान करने में सफल रही।
सांस्कृतिक संध्या का भव्य शुभारंभ
विरासत महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या का उद्घाटन ओएनजीसी के पूर्व निदेशक (मानव संसाधन) डॉ. अशोक बालियान और आईएमएस यूनिसन यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. अनिल सुब्बाराव ने दीप प्रज्वलन के साथ किया। इस अवसर पर विश्व विख्यात वीणा वादक रमण बालचंद्रन, बांसुरी वादक पंडित प्रवीण गोडखिंडी और किराना घराने के गायक पंडित जयतीर्थ मेवुंडी की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। इसके अतिरिक्त, शास्त्रीय संगीत की प्रख्यात हस्ती शैलजा खन्ना के टॉक शो ने ज्ञान और प्रेरणा का प्रसार किया।
रमण बालचंद्रन की वीणा ने बांधा समां
कर्नाटक संगीत परंपरा के मशहूर वीणा वादक रमण बालचंद्रन ने अपनी प्रस्तुति से सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत की। उनकी वीणा पर राग अबोगी (नम्मू ब्रोवा), रागम-खमाज, आदि तालम पर पल्लवी और राग सिंधु भैरवी में थिलाना ने भक्ति और शांति का वातावरण बनाया। मृदंगम पर सतीश कुमार ने उनकी संगत की। रमण की प्रतिभा को कम उम्र में ही पहचान मिली, जब उन्हें 16 वर्ष की आयु में ऑल इंडिया रेडियो द्वारा ‘ए’ ग्रेड और मद्रास संगीत अकादमी में प्रदर्शन का अवसर मिला। उनकी मां शरण्या उनकी पहली गुरु थीं, और बाद में विदुषी बी. नागलक्ष्मी ने उन्हें प्रशिक्षित किया। उनकी अनूठी शैली और वैश्विक मंचों पर प्रस्तुतियां उन्हें सबसे युवा और प्रभावशाली वीणा वादकों में शुमार करती हैं।
प्रवीण गोडखिंडी की बांसुरी ने छुआ दिल
प्रख्यात हिंदुस्तानी शास्त्रीय बांसुरी वादक पंडित प्रवीण गोडखिंडी ने राग वाचस्पति से अपनी प्रस्तुति शुरू की, जिसमें तबले पर सुमित मिश्रा ने संगत की। उनकी गायकी और तंत्रकारी शैली ने जटिल लय और तकनीकी कौशल का प्रदर्शन किया। प्रस्तुति का समापन पहाड़ी धुन के भावपूर्ण गायन के साथ हुआ, जो प्रशंसकों की मांग पर प्रस्तुत किया गया। छह वर्ष की उम्र में पहला प्रदर्शन देने वाले प्रवीण ने पंडित वेंकटेश गोडखिंडी और अनूर अनंत कृष्ण शर्मा से प्रशिक्षण लिया। उस्ताद ज़ाकिर हुसैन और पंडित विश्व मोहन भट्ट जैसे दिग्गजों के साथ सहयोग, विश्व बांसुरी महोत्सव में भागीदारी और राष्ट्रीय पुरस्कार उनकी उपलब्धियों में शामिल हैं। उन्हें सुरमणि, नाद-निधि और सुर सम्राट जैसे सम्मानों से नवाजा गया है।
पंडित जयतीर्थ मेवुंडी की गायकी ने रिझाया
किराना घराने के प्रख्यात गायक पंडित जयतीर्थ मेवुंडी ने राग जोगकौंस से अपनी प्रस्तुति शुरू की, जिसमें हारमोनियम पर सुमित मिश्रा और तबले पर अभिषेक मिश्रा ने संगत की। उनकी भावपूर्ण और सटीक गायकी ने श्रोताओं को भक्ति और शांति के रस में डुबो दिया। हुबली, कर्नाटक में जन्मे मेवुंडी ने अपनी मां से भजन गायन सीखा और पंडित अर्जुनसा नाकोड़ व श्रीपति पडिगर से कठोर प्रशिक्षण लिया। 1995 में सवाई गंधर्व महोत्सव में उनके प्रदर्शन ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा ‘ए टॉप’ ग्रेड, नेपाल विश्वविद्यालय से नाद योग में पीएचडी, और यंग मेस्ट्रो, आदित्य विक्रम बिड़ला कला किरण जैसे पुरस्कार उनकी उपलब्धियां हैं। उन्होंने राग विष्णुप्रिया, परिमल और भिन्न गंधार जैसे नए रागों की रचना की और भक्ति बंदिशें लिखीं।
शैलजा खन्ना का टॉक शो: संगीत का ज्ञानवर्धन
प्रख्यात संगीत विशेषज्ञ शैलजा खन्ना के टॉक शो ने “भारतीय शास्त्रीय संगीत और संरक्षकों की भूमिका” पर प्रकाश डाला। यूपीईएस में आयोजित इस सत्र में उन्होंने कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत के अंतर को समझाया। कर्नाटक संगीत के सात तालों और भक्ति परंपरा, वेंकटमाखिन के 72 मेलकर्ता रागों, थाट की ऐतिहासिक भूमिका और ध्रुपद, हवेली संगीत जैसी शैलियों पर चर्चा की। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा और छह प्रमुख तबला व गायन घरानों (आगरा, किराना) के महत्व पर जोर दिया। किशोरी अमोनकर और लता मंगेशकर का एक रोचक किस्सा साझा कर उन्होंने शास्त्रीय संगीत की गहराई और लोकप्रियता के अंतर को रेखांकित किया। उन्होंने विरासत के 30 वर्षों के सांस्कृतिक योगदान की प्रशंसा की।
आयोजन की विशेषताएं और प्रभाव
विरासत महोत्सव ने बच्चों की कला और शास्त्रीय संगीत के मेल से एक अनूठा मंच प्रदान किया। बच्चों की रचनात्मकता और दिग्गज कलाकारों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभव से जोड़ा। आयोजन ने उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और नई पीढ़ी को प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।